कोपेनहेगन में कूटनीति तेज़

जलवायु परिवर्तन पर चल रहा कोपेनहेगन सम्मेलन में जैसे-जैसे समझौते की समयसीमा क़रीब आ रही है, पर्दे के पीछे कूटनीति तेज़ हो गई है.

हालाँकि फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी ने चेतावनी दी है कि सम्मेलन की नाकामी सबके लिए बुरा होगा.

सार्कोज़ी ने यूरोपीय देशों, अमरीका और चीन से अपील की है कि वे समझौते के लिए और रियायत दें.

दुनिया के कई नेताओं ने इस पर संदेह व्यक्त किया है कि समझौता हो सकता है.

अमरीका ने वादा किया है कि वह हर साल 100 अरब डॉलर की सहायता राशि देगा ताकि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ग़रीब देशों की मदद की जा सके.

लेकिन अमरीका इस पर ज़ोर दे रहा है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर बाध्यकारी समझौता हो, जिसका चीन और अन्य देश विरोध कर रहे हैं.

समझौते की आहट

इस बीच चीन ने संकेत दिया है कि वह उत्सर्जन की निगरानी पर रियायत देने के लिए तैयार हो सकता है.

जानकारों का कहना है कि शुक्रवार को होने वाली बैठक में नेताओं को बड़े फ़ैसले लेने पड़ सकते हैं.

हालाँकि संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन के लीक हुए एक दस्तावेज़ के मुताबिक़ संकेत ये दिए जा रहे हैं अगर सबसे बेहतर समझौता भी हुआ तो तापमान में बढ़ोत्तरी दो सेल्सियस से कम नहीं हो सकती.

इस दस्तावेज़ में यह भी कहा गया है कि अगर दुनिया के देश अपने बड़े-बड़े वादे भी पूरे करें तो तापमान तीन सेल्सियस बढ़ेगा.

बीबीसी संवाददाता के मुताबिक़ समझौते को लेकर कई मुद्दों पर चिंता जताई जा रही है लेकिन समझौते की राह में सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा है, वित्तीय सहायता का मामला.

अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा है कि उनकी सरकार विकासशील देशों के लिए एक साल में 100 अरब डॉलर की सहायता देने को तैयार है.

मुद्दा

लेकिन साथ में उन्होंने यह भी कहा कि अमरीका ऐसा तभी करेगा जब समझौते में अमरीकी ज़रूरतों का ख़्याल रखा जाए.

हिलेरी क्लिंटन के भाषण में 'पारदर्शिता' का मुद्दा भी उभर कर आया, जिस पर चीन आपत्ति करता रहा है. पारदर्शिता यानी कार्बन उत्सर्जन में कटौती के वादे की निगरानी.

इस मुद्दे को समझौते की दिशा में आर-पार का मुद्दा माना जा रहा है. हालाँकि चीन के विदेश उप मंत्री हे याफ़ेई ने कहा है कि वे इस मुद्दे पर भी बातचीत और सहयोग के लिए तैयार हैं बशर्ते इसमें चीन की संप्रभुता का उल्लंघन न हो.

इससे पहले इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुसीलो बम्बांग युधोयोनो ने सभी विकसित और विकासशील देशों से अपील की कि वे निगरानी के मुद्दे पर लचीला रुख़ अपनाएँ.

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