समझौते की कोशिश में माथापच्ची

कोपेनहेगन

दुनियाभर के शीर्ष नेता कोपेनहेगन सम्मेलन में समझौते की कोशिश में जुटे हुए हैं.

समझौते की राह में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए यह अहम बैठक तय समयसीमा से भी ज़्यादा खिंच रही है.

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ, भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अन्य नेताओं से मुलाक़ात कर रहे हैं. ताकि आख़िरी क्षण में समझौता हो सके.

कोपेनहेगन में मौजूद बीबीसी संवाददाता का कहना है कि समझौते पर अभी तक कोई सहमति नहीं बन पाई है और अभी यह स्पष्ट भी नहीं है कि ऐसा कब होगा.

समझौते को लेकर धनी देशों और ग़रीब देशों के बीच खाई कितनी बड़ी है, इसका अंदाज़ा ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा के बयान से मिलता है.

लूला डी सिल्वा का कहना है कि यह विकासशील देशों के प्रति निष्पक्षता नहीं होगी कि उनसे और रियायत की उम्मीद की जाए.

भ्रम

जलवायु परिवर्तन पर हो रहे कोपेनहेगन सम्मेलन के आख़िरी दिन प्रतिनिधियों के मन में भ्रम की स्थिति बनी रही, क्योंकि उन्हें समझौते के कई मसौदे दिए गए.

अमरीका, यूरोपीय संघ के देशों और चीन ने कोई नई बात नहीं कही थी, इस कारण यह धारणा बनने लगी कि समझौते की संभावना नहीं.

अब ख़बर ये है कि समझौते के लिए नए मसौदे पर विचार-विमर्श चल रहा है और ये लंबा खिंच सकता है.

सबसे बड़ा अवरोध चीन और अमरीका के रुख़ को लेकर है. अमरीका पर ये आरोप है कि वह इस सम्मेलन में काफ़ी देर से प्रस्ताव लेकर आया है, तो चीन कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य में अंतरराष्ट्रीय निगरानी के लिए तैयार नहीं है.

जबकि अमरीका का कहना है कि कार्बन उत्सर्जन से संबंधित विधेयक सीनेट में तभी जा सकता है जब चीन निगरानी को स्वीकार करे.

चीन के साथ-साथ भारत भी कार्बन उत्सर्जन को लेकर बाध्यकारी क़ानून के लिए राज़ी नहीं है.

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