कोपेनहेगन में 'समझौता' पारित

जलवायु परिवर्तन
Image caption औद्योगिक देश नहीं चाहते थे कि इस समय क़ानूनी रुप से बाध्यकारी कोई समझौता हो

जलवायु परिवर्तन सम्मेलन की अंतिम तिथि ख़त्म होने के एक दिन बाद आख़िर उसी समझौते को पारित कर दिया गया है जिसे अमरीका ने भारत, ब्राज़ील और चीन सहित कुछ विकासशील देशों के साथ मिलकर तैयार किया था.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने इसका स्वागत किया है लेकिन कहा है कि इस समझौते को अगले साल तक क़ानूनी रुप से बाध्यकारी बना दिया जाना चाहिए.

इससे पहले इस सम्मेलन में इस समझौते पर सर्वसम्मति बनाने में सफलता नहीं मिल सकी क्योंकि कुछ विकासशील देश इसके ख़िलाफ़ थे.

निकारागुआ और वेनेज़ुएला सहित कई दक्षिण अफ़्रीकी देशों का कहना था कि यह समझौता सही प्रक्रिया के ज़रिए नहीं हुआ है.

बीबीसी के पर्यावरण संवाददाता रिचर्ड ब्लैक का कहना है कि इस समझौते से कई देशों को निराशा होगी क्योंकि वे जलवायु परिवर्तन पर कड़ी कार्रवाई वाला समझौता चाहते थे.

उनका कहना है कि ऐसा दिखता नहीं है कि इस समझौते के ज़रिए तापमान में बढ़ोत्तरी को 2 डिग्री सेंल्शियस तक सीमित रख सकेगा और अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि इसे औपचारिक रुप से संयुक्त राष्ट्र का समझौता कहा जाएगा या नहीं.

शुरुआत

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा, "आख़िरकार हमने एक समझौता कर लिया."

उन्होंने कहा, "हो सकता है कि यह वैसा न हो जैसा हम चाहते थे लेकिन जिस पर भी सहमति हुई है वह एक ज़रुरी शुरुआत है."

लेकिन उन्होंने आगे कहा, "हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हम इस समझौते को अगले साल तक क़ानूनी रुप से बाध्यकारी बना लें."

उनका कहना था, "इसकी महत्ता तभी समझ में आएगी जब इसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून का रुप दे दिए जाएगा."

दुनिया भर के प्रतिनिधि रात भर प्रयास करते रहे कि सम्मेलन कहीं बिना किसी समझौते के समाप्त न हो जाए.

अमरीकी समझौता

इससे पहले अमरीका ने भारत, ब्राज़ील और चीन सहित कुछ प्रमुख विकासशील देशों के साथ मिलकर संभावित समझौते पर सहमति बनाई थी, जिसे राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 'अर्थपूर्ण समझौता' कहा था.

लेकिन इस प्रस्ताव को कुछ विकासशील देशों ने यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि इस समझौते से ख़तरनाक जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहायता नहीं मिलेगी.

इसके बाद बहुत से देश मेज़बान देश डेनमार्क से अनुरोध करते रहे कि वह इस समझौते को स्वीकार कर ले.

जिस समझौते पर मंज़ूरी हुई है उसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए वर्ष 2020 तक ग़रीब देशों को 100 अरब डॉलर प्रतिवर्ष दिए जाएँगे.

इस समझौते के अनुसार यह सुनिश्चित करने के लिए भी तरीक़े विकसित किए जाएँगे कि औद्योगिक देश अपने उत्सर्जन में कमी कर रहे हैं.

अमरीका ने कहा है कि चीन को इस प्रक्रिया का विरोध छोड़ देना चाहिए.

ब्रिटेन के जलवायु परिवर्तन मामलों के मंत्री एड मिलिबैंड ने कहा है कि यह महत्वपूर्ण था कि समझौते के पारित होने के साथ ही इसके लिए धन आना शुरु हो जाएगा.

लेकिन उन्होंने कहा, "हम महसूस करते हैं कि इस समझौते को और महत्वाकांक्षी होना चाहिए था. इसलिए हमें कोशिश करनी होगी कि यह समझौता क़ानूनी रुप से बाध्यकारी बनाया जा सके और अधिक महत्वाकांक्षी भी."

विरोध

पाँच देशों के इस समझौते के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा विरोध किया लातिनी अमरीकी देशों ने जिसमें निकारागुआ और वेनेज़ुएला के अलावा क्यूबा, एक्वाडोर और बोलिविया शामिल हैं.

130 देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे लुमुंबा डायपिंग ने इसे इतिहास का सबसे बुरा प्रस्ताव बताया था. उनका कहना था यह मसौदा 'अफ़्रीका को आत्महत्या के पहले लिखे गए पत्र' पर हस्ताक्षर करने जैसा है.

उनका कहना था, "सौ अरब डॉलर का वादा करके कोई हमें अपने महाद्वीप को नष्ट करने के लिए घूस नहीं दे सकता."

प्रशांत महसागार के तटीय देश तुवालु ने विकासशील देशों और अमरीका के बीच बनी सहमति को अस्वीकार्य बताया था.

समझौता पारित होने से पहले यूरोपीय आयुक्त जोस मैनुअल बर्रोसो ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा था, "मैं अपनी निराशा को छिपाना नहीं चाहता कि क़ानूनी रुप से बाध्यकारी कोई समझौता नहीं हो पा रहा है."

हालांकि उन्होंने संकेत दे दिए थे कि यूरोपीय संघ अमरीका के प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार है.

जो देश इसका विरोध कर रहे थे वे चाहते थे कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती इतनी करनी पड़ेगी जिससे कि तापमान को 1.5 डिग्री से अधिक न बढ़ने दिया जाए.

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