अफ़ग़ानिस्तान पर इस्तांबुल में बैठक

हामिद करज़ई और आसिफ़ अली ज़रदारी
Image caption तुर्की के इस्तांबुल शहर में अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के नेताओं के बीच बैठक

तुर्की के इस्तांबुल शहर में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपतियों की दो दिवसीय बैठक शुरु हुई है जिसमें तालेबान के नेतृत्व में चल रहे विद्रोह से निपटने की कोशिश की जाएगी.

बाद में दोनों देशों के अधिकारी भी इस बैठक में शामिल होंगे जिससे एक क्षेत्रीय रणनीति पर सहमति बन सके.

तुर्की के पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों से नज़दीकी संबंध हैं इसलिए उसे आशा है कि तालेबान की समस्या पर हो रही इस बातचीत में वह एक सकारात्मक भूमिका निभा सकेगा.

पिछले तीन सालों में तुर्की में इस विषय पर यह तीसरी बैठक हो रही है. इसमें तीनों देशों की सेनाओं और ख़ुफ़िया विभाग के अधिकारी भी शामिल होंगे.

नेटो का सदस्य देश होने के नाते तुर्की के सत्रह सौ सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अंतर्राष्ट्रीय बल में शामिल हैं लेकिन वो लड़ाई में हिस्सा नहीं लेते. अमरीका के दबाव के बावजूद तुर्की ने यह फ़ैसला किया कि उसके सैनिक अपने मुसलमान भाइयों को न मार कर एक बेहतर भूमिका निभा सकते हैं.

तुर्की ने यह प्रस्ताव भी रखा था कि अगर कभी तालेबान नेताओं के साथ शांति वार्ताएं होती हैं तो वह उसमें मध्यस्थता करने को तैयार है. लगता है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी और अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई के बीच इन शांति वार्ताओं पर भी बातचीत होगी. बाद में इस बैठक में अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लगे चार अन्य देशों के प्रतिनिधि भी भाग लेंगे.

यह माना जा रहा है कि इस बैठक का उद्देश्य लंदन में बृहस्पतिवार को होने वाले शिखर सम्मेलन के लिए ज़मीन तैयार करना है.

लेकिन तुर्की अपने लिए एक अलग भूमिका चाहता है. अफ़ग़ानिस्तान में उज़्बेक और तुर्कमेन समुदाय की एक बड़ी आबादी है लेकिन अभी तक तुर्की उन्हे प्रभावित करने में सफल नहीं हो पाया है. फिर भी वह इस इलाक़े में स्वयं को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में देखना चाहता है.

'तालेबान हिंसा में बढ़ोतरी होगी'

Image caption जनरल स्टेंली मैक्क्रिस्टल ने चेतावनी दी है कि इस साल तालेबान की हिंसा में बढ़ोतरी हो सकती है

इस बीच अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका के सर्वोच्च कमांडर जनरल स्टैंली मैक्क्रिस्टल ने चेतावनी दी है कि इस साल तालेबान की हिंसा में बढ़ोतरी हो सकती है. उनका कहना है कि तालेबान दुनिया के सामने ये तस्वीर रखना चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान जल रहा है औऱ राष्ट्रपति करज़ई और उनके पश्चिमी सहयोगी स्थिति से निपट नहीं पा रहे हैं.

राष्ट्रपति ओबामा ने 30 हज़ार और अमरीकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान भेजने की घोषणा की थी जिनमें से काफ़ी वहां पहुंच चुके हैं इसलिए तालेबान के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई में तेज़ी आएगी.लेकिन जनरल मैक्क्रिस्टल ने स्पष्ट किया कि अंतत इस समस्या का राजनीतिक हल ही निकालना होगा.

सैन्य अभियान में तेज़ी लाने का उद्देश्य तालेबान पर दबाव बनाना, तालेबान के नेताओं को यह बतलाना है कि वो जीत नहीं सकते, उन्हे कमज़ोर बनाना है जिससे जब उनसे बातचीत करने का मौक़ा आए तो उनकी स्थिति कमज़ोर हो चुकी हो.

पिछले सप्ताह ही अमरीका के प्रतिरक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने तालेबान को अफ़ग़ानिस्तान के राजनीतिक ढांचे का हिस्सा बताया था जो अमरीकी नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है. हालांकि ओबामा प्रशासन के भीतर और अमरीका और उसके सहयोगी देशों के बीच इसे लेकर मतभेद हैं कि ओबामा डेढ़ साल के भीतर अपने सैनिकों को वहां से वापस बुला लेना चाहते हैं.

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