'इराक़ पर हमला ग़ैरक़ानूनी था'

सद्दाम हुसैन
Image caption सद्दाम हुसैन पर आरोप लगाया गया था कि उनके पास महाविनाश के हथियार हैं

इराक़ पर हमले के समय ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय के मुख्य क़ानूनी सलाहकार रहे माइकल वुड ने कहा है कि इराक़ पर युद्ध थोपना ग़ैरक़ानूनी था.

अमरीका के नेतृत्व में इराक़ पर किए गए हमलों की जाँच कर रहे आयोग के सामने बयान दर्ज करवाते हुए उन्होंने कहा है कि तत्कालीन विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ ने उनकी बात सुनने की बजाय इस मामले में एटॉर्नी जनरल गोल्ड स्मिथ की राय पर अमल करना उचित समझा.

वैसे माइकल वुड ऐसा कहने वाले अकेले अधिकारी नहीं हैं क्योंकि इस आयोग के सामने एक और अधिकारी ने क़ानूनी सलाह को लेकर तत्कालीन सरकार के रवैये की एक और अधिकारी ने निंदा की है.

उल्लेखनीय है कि मार्च 2003 में अमरीका के नेतृत्व में ब्रिटेन और दूसरे पश्चिमी देशों ने इराक़ पर हमला कर दिया था. इनका आरोप था था कि इराक़ के पास महाविनाश के हथियार हैं.

अनदेखी का आरोप

इन हमलों से ही इन हमलों की वैधता को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं और ब्रिटेन का इन हमलों में साथ देना एक विवाद का विषय रहा है. इस समय जाँच आयोग में जो बयान दर्ज किए जा रहे हैं वो सरकार के लिए असुविधाजनक साबित हो सकते हैं. सर माइकल वुड ने कहा है कि मुख्य क़ानूनी सलाहकार के रुप में उनकी राय थी कि इराक़ पर हमला अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के ख़िलाफ़ है और उन्होंने चेतावनी दी थी कि इससे मंत्रियों और ब्रिटेन की प्रतिष्ठा पर आँच आ सकती है.

जाँच आयोग के समक्ष माइकल वुड ने कहा, “मैंने कहा था कि ब्रिटेन की सरकार अगर क़ानूनी सलाह के विपरीत काम करती है तो ये मंत्रालय के प्रावधानों के ख़िलाफ़ होगा. साथ ही मैंने ये भी कहा था कि इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने ब्रिटेन की साख खराब होगी.”

माइकल वुड की सहायक अधिकारी रहीं एलिज़ाबेथ विल्मशर्ट ने इराक़ पर हमले के मामले को लेकर अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. एलिज़ाबेथ ने जांच आयोग के समक्ष कहा है कि इराक़ पर हमले की प्रक्रिया ‘निराशाजनक’ थी और इसमें ‘पारदर्शिता की कमी’ थी.

Image caption अधिकारियों का कहना है कि तत्कालीन विदेश मंत्री ने एटॉर्नी की राय बहुत देर से माँगी

उन्होंने सवाल उठाया कि किस तरह सरकार ने हमले के कुछ दिनों पहले ही अटॉर्नी जनरल लॉर्ड गोल्ड स्मिथ से कहा गया कि वे हमले के विषय में अपनी राय दें.

उन्होंने कहा, “सद्दाम हुसैन को उनके अपने संपर्कों से मिलने वाले लाभ को ध्यान में रखने के बाद अटॉर्नी जनरल के लिए यह सलाह देना कि संयुक्त राष्ट्र के दूसरे प्रस्ताव के बिना हमला करना ग़ैरक़ानूनी होगा, बहुत कठिन रहा होगा. एटॉर्नी जनरल से इतने विलंब से सलाह लेना असाधारण सी बात थी.”

अब नज़रें तत्कालीन एटॉर्नी जनरल लॉर्ड गोल्डस्मिथ पर हैं जिन्होंने हमले से दस दिन पहले सरकार को यह सलाह दी थी कि हमले से पहले संयुक्त राष्ट्र से दूसरा प्रस्ताव पारित करवा लेना सुरक्षित होगा.

लॉर्ड गोल्डस्मिथ बुधवार को जाँच आयोग से समक्ष पेश होंगे.

संबंधित समाचार