मून का विकासशील देशों की मदद पर ज़ोर

Image caption बान की मून ने कोपेनहेगन में किए गए वायदे को गंभीरता से लिया है

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन और इथियोपिया के प्रधानमंत्री मेलस ज़नावी को, अरबों डॉलर की उस राशि को जुटाने की ज़िम्मेदारी सौंपी है, जिसका कोपेनहेगन सम्मेलन के दौरान वायदा किया गया था.

ब्राउन और ज़नावी एक उच्चस्तरीय पैनल की अध्यक्षता करेंगे जो धन की उगाही के तरीक़े खोजेगा. इस समिति में विकसित देशों और विकासशील देशों का बराबर का प्रतिनिधित्व रहेगा.

उल्लेखनीय है कि सम्मेलन में धनी देशों ने जलवायु परिवर्तन से प्रभावित ग़रीब देशों को 2012 तक हर साल 10 अरब डॉलर देने का आश्वासन दिया था.

ये भी कहा गया था कि 2015 से 2020 के बीच इस राशि को बढ़ा कर सालाना 100 अरब डॉलर कर दिया जाएगा.

लेकिन सम्मेलन के दौरान ये स्पष्ट नहीं किया गया कि ये धन आएगा कहाँ से.

अबाध्यकारी समझौता

बान की मून ने जिस समिति के गठन की घोषणा की है उसे दिसंबर में मेक्सिको में होने वाले अगले जलवायु शिखर सम्मेलन से पहले उन उपायों की अनुशंसा करने को कहा गया है जो कि ग़रीब देशों को वायदे के मुताबिक धन उपलब्ध कराने में सहायक हो सके.

वैज्ञानिकों का मानना है कि विकासशील देश ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से सबसे बुरी तरह प्रभावित होंगे.

ख़ास कर समुद्र के बढ़ते जलस्तर से ज़्यादा तबाही छोटे विकासशील देशों में मचेगी. ऐसे देशों को ही ध्यान में रख कर कोपेनहेगन में हुए समझौते में आर्थिक सहायता का उल्लेख किया गया था.

लेकिन अमरीका, चीन, भारत, दक्षिण अफ़्रीका और ब्राज़ील की पहल पर सम्मेलन के अंतिम क्षणों में हुआ ये समझौता बाध्यकारी नहीं है.

संबंधित समाचार