सू ची की अपील ख़ारिज

ऑंग सां सू ची
Image caption सु्प्रीम कोर्ट ने सू ची की अपील ख़ारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सांग सू ची की अपील ख़ारिज कर दी है.

सू ची ने नज़रबंदी की अवधि बढ़ाए जाने के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी.

20 साल पहले हुए पिछले आम चुनावों में आंग सांग सू ची की लोकतंत्र समर्थक पार्टी की शानदार जीत को बर्मा की सैन्य सरकार ने मानने से इनकार कर दिया था.

बर्मा की सैन्य सरकार ने वर्ष 2010 में नए चुनाव करवाने की घोषणा की थी.

लेकिन आंग सांग सू ची को सैन्य सरकार ने आगामी चुनाव लड़ने के अयोग्य क़रार दिया था.

पिछले 20 सालों से सू ची ज्यादातर समय हिरासत में ही गुज़ार रही हैं.

सू ची के वकील न्यान विन ने सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ अपील करने की बात कही है.

सुप्रीम कोर्ट ने सू ची की अपील ख़ारिज करने की कोई वजह नहीं बताई है.

'निराशाजनक'

अपील की सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद ब्रिटन के राजदूत एंड्रू हेन ने कहा कि ये फैसला ‘बेहद निराशाजनक’ था.

समाचार एजेंसी एपी ने एंड्रू हेन के हवाले से लिखा है, “हम यही मानते हैं कि अन्य दो हज़ार से ज्यादा लोकतंत्र समर्थक बंदियों के साथ सू ची की जल्द से से जल्द रिहाई हो जानी चाहिए.”

सू ची को मई 2009 में रिहा किया जाना था.

लेकिन अगस्त 2009 में नज़रबंदी की शर्तों के उल्लंघन के आरोप में उनकी हिरासत की अवधि बढ़ा दी गई.

बर्मा की सैन्य सरकार का कहना था कि एक अमरीकी व्यक्ति के तैर कर उनके घर पहुंच जाने से नज़रबंदी की शर्त टूटी है.

इससे पहले भी एक निचली अदालत ने सू ची की अपील ठुकरा दी थी.

इस बार भी सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अपेक्षित ही माना जा रहा था.

अमरीका, यूरोपीय संघ और कुछ अन्य देशों ने बर्मा की सैन्य सरकार के इस रवैये को देखते हुए बर्मा के ख़िलाफ़ प्रतिबंध और बढ़ा दिए थे.

प्रतिबंधों के बावजूद बर्मा की सैन्य सरकार के रवैये में कोई बदलाव न देखते हुए अमरीका ने इस सिलसिले मे कोई और रास्ता निकालने की बात कही है.

संबंधित समाचार