मराठी सिनेमा की नई पारी

हरिश्चंद्राची फैक्ट्री का दृ्श्य
Image caption मराठी फ़िल्में अब हर क्षेत्र में बेहतर कर रही है.

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शुरुआत 1954 में हुई जिसमें एक मराठी फिल्म ने राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक जीता. भारत में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में इसे सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है.

पचास साल बाद 2004 में एक और मराठी फिल्म श्वास ने यह सम्मान हासिल किया.

लेकिन बीच के दशकों में मराठी भाषी फिल्मों के सामने कई चुनौतियां पेश आईं.

वजह मुंबई की मराठी धरती पर बॉलीवुड का हिंदी फिल्म उद्योग अपनी जड़ें लगातार मजबूत करता रहा.

श्वास ने मराठी सिनेमा के लिए एक नई शुरुआत की इबारत लिखी है.

पिछले साल दस से अधिक मराठी फिल्में प्रदर्शित हुईं. कुछ ने अंतरराष्ठ्रीय फिल्म समारोहों में अच्छी प्रतिस्पर्धा दी और कई फ़िल्मों ने तो घरेलू मोर्चे पर अच्छा कारोबार भी किया.

एक ऐसा उद्योग जिसे बालिवुड के साए तले रहना पड़ता है, के लिए यह एक अच्छी वापसी है.

देश-विदेश में चर्चा

मराठी फिल्म हरीशचंद्राची फैक्ट्री ने तो 2010 में आस्कर पुरस्कारों के लिए भारत की ओर से आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर जगह भी बनाई है.

Image caption परेश ने दादा साहब फ़ाल्के के जीवन पर फ़िल्म बनाई है.

यह फिल्म दादासाहेब फाल्के के जीवन पर आधारित है.

दादासाहेब फाल्के ने भारत की पहली मूक फिल्म राजा हरीशचंद्र का निर्माण किया था. फिल्म को सार्वजनिक तौर पर काफी वाहवाही मिली थी और इसने बड़ी संख्या में दर्शकों को अपनी ओर खींचा था.

फिल्म के निर्देशक परेश मोकाशी जो पहली बार किसी फिल्म का निर्माण कर रहे हैं, ने कहा कि दादासाहेब फाल्के के जीवन के बारे में पढ़ने के बाद इस कहानी को पर्दे पर लाने की प्रेरणा मिली.

परेश कहते हैं, ‘‘मैंने दो महीने तक रिसर्च किया और फिल्म से जुड़े हर एक पहलू को तैयार किया. दिसंबर 2008 में फिल्म तैयार हो गई और पिछले साल इसे फिल्म समारोहों के लिए भेजा गया. इसे वाहवाही मिली और नामी गिरामी फिल्म प्रोड्यूसरों और डिस्ट्रीब्यूटरों ने इसमें रूचि दिखाई है.’’

हाल के दिनों में मराठी सिनेमा की सफलता की कई वजहें हैं.

कई युवा फिल्म निर्माता अब अपनी फिल्मों को नामी-गिरामी फिल्म समारोहों में भेजने लगे हैं. ये फिल्में चर्चा में आती हैं. किसी बड़ी मार्केटिंग मशीनरी के अभाव में फिल्मों के लिए यही सबसे बड़ी जरूरत भी है.

मराठी फ़िल्म विहिर (झरना) बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में भाग ले रही है, गाभरिचा पउस (मेघ न बरसे) ने हाल ही में संपन्न फ्रेंच फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार भी जीता. और मराठी फिल्मों ने तो रोटरडैम फिल्म समारोह में अपनी उपस्थित भी दर्ज कराई है.

ये फिल्में शहरों के तनाव भरी जीवन शैली, संबंधों, किसानों की ओर की जा रही आत्महत्या औऱ बुजुर्गों पर आधारित हैं.

फिल्मों में हैं बच्चों की कहानियां, राजनीतिक ड्रामेबाजी और कॉमेडी भी.

विश्लेषकों का मानना है कि मराठी एंटरटेनमेंट चैनलों के विकास से भी अभी तक बीमार पड़े मराठी फिल्म उद्योग को मदद मिली है.

जी नेटवर्क के नितिन वैद्य का कहना है, ‘‘अभी दशक भर पहले की ही बात है यह उद्योग करीब-करीब मर चुका था. यहां प्रतिभा की कोई कमी नहीं है लेकिन प्रमोशन और डिस्ट्रिब्यूशन समस्या रही है. यह काम नहीं कर रहा था.’’

दर्शकों की बढ़ती तादाद

नितिन कहते हैं, ‘‘जब मराठी मनोरंजन चैनलों को 1999 में शुरु किया गया तो दर्शकों का एक आधार तैयार हो गया. इन कार्यक्रमों को दर्शक बड़ी संख्या में देखते हैं. सो, हमने सोचा कि क्यों न इस क्षेत्र में प्रवेश किया जाए और गैप को भरा जाए.’’

नितिन स्वीकार करते हैं कि फॉर्मूला यह है कि टेलीविजन के दर्शकों को मराठी फिल्मों को देखने के लिए थिएटर जाने के लिए प्रेरित किया जाए.

मल्टीप्लेक्स की बढ़ती संख्या से भी क्षेत्रीय सिनेमा के प्रसार में मदद मिली है.

पहले सिर्फ एक पर्दे वाले सिनेमा में सिर्फ हिंदी फिल्मों को प्रदर्शित किया जा सकता था लेकिन अब मल्टीप्लेक्सों में मराठी फिल्मों का भी प्रदर्शन हो रहा है और यहां दर्शकों की अच्छी भीड़ भी जुट रही है.

महाराष्ट्र के लोकनृत्य पर आधारित एक फिल्म नाट्यरंग कई मामलों में मिथक तोड़ रही है. फिल्म के प्रदर्शन के तीन हफ्ते बाद भी भारी संख्या में दर्शक सिनेमाघरों में जुट रहे हैं.

योग्य फिल्मकारों की पौध

नाट्यरंग के निर्देशक रवि जाधव विज्ञापन उद्योग में काम करते हैं.

उनका कहना है, ‘‘हालांकि फिल्म में कई गंभीर मसले मौजूद हैं लेकिन हमें दर्शकों को बांधे रखना पड़ता है.’’

कारोबार से जुड़े विश्लेषकों का मानना है कि युवा फिल्म निर्माता तकनीकी जानकारियों से लैस होते हैं, वे कॉरपोरेट जगत की कार्य शैली से वाकिफ होते हैं, साथ ही उनमें अपने विषय के साथ जोखिम उठाने की क्षमता भी होती है.

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