मेलबर्न में आए दुनिया भर के नास्तिक

मेलबोर्न
Image caption मेलबोर्न में इससे पहले एक धार्मिक बैठक हुई थी

ऑस्ट्रेलिया के शहर मेलबर्न में रविवार को 2000 से ज़्यादा ऐसे लोग जमा हुए जिन्हें धर्म या ईश्वर में विश्वास नहीं.

कहा जाता है कि पहली बार इतनी बड़ी संख्या में नास्तिक विचारधारा वाले लोग किसी जगह एकत्रित हुए.

यहां जमा होने वाले लोगों में न्यूज़ीलैंड, अमरीका यहां तक कि ईरान से भी आने वाले प्रतिनिधि शामिल थे.

उनके एक जगह एकत्रित होने का मक़सद समाज पर धर्म के नकारात्मक प्रभाव पर अपना बयान जारी करना था.

इस साल के शुरू में इसमें शामिल होने के लिए सारे के सारे 2500 टिकट बिक चुके थे. लेकिन दिसंबर में इसी जगह एक धार्मिक बैठक हुई थी जिसमें इसके मुक़ाबले तीन गुना अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया था.

बीबीसी के धार्मिक मामलों के संवाददाता क्रिस्टोफ़र लैंडॉ का कहना है कि ग्लोबल ऐथीस्ट कॉन्वेंशन ने वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, लेखकों और कॉमेडियनों को एक जगह एकत्रित कर दिया है.

इसमें प्रसिद्ध बेस्ट सेलिंग लेखक रिचर्ड डॉकिंस के अलावा तस्लीमा नसरीन भी शामिल थीं.

डॉकिंस ने द कॉस्ट ऑफ़ डेल्युज़न यानी भ्रम की क़ीमत के शीर्षक से होने वाली एक बैठक में इस्लाम और चरमपंथ पर अपने विचार व्यक्त किए.

इस सम्मेलन में एक फ़िल्म की योजना पर बात हुई जिसमें यह दिखाया जाएगा कि टैक्स देने वालों के कितने पैसे धर्म को कम करने के लिए ख़र्च होते हैं.

इस में आने वाले प्रतिनिधियों से कहा गया कि वह अपने अधर्मी पैग़ाम को पहुंचाने के लिए मिशनरी जोश और उत्साह से बचें.

इस्लाम और भारत निशाने पर

लेज़ली कैन्नॉल्ड ने अपने आपको अनीश्वरवादी बताते हुए कहा कि वह सांस्कृतिक रूप से यहूदी हैं और अपनी बातों से लोगों को काफ़ी हंसाया.

लेकिन जब तस्लीमा नसरीन बोलने के लिए आईं तो माहौल कुछ गंभीर हो गया.

उन्होंने कहा कि भारत जो अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाना पसंद करता है उसने उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुक़ाबले अल्पसंख्यक मुसलमानों के धार्मिक हितों को आगे रखा.

उन्होंने कहा कि किस प्रकार बचपन में ही धर्म के बारे में उनके मन में शंका पैदा होने लगी थी जब वह अपनी मां को इस प्रकार के प्रश्न से परेशान कर देतीं थीं कि हमें अरबी भाषा में ही नमाज़ क्यों पढ़नी पड़ती है, जब ख़ुदा हर जगह मौजूद है तो वह बंगाली भाषा में हमारी प्रार्थना को क्यों नहीं समझ सकता.

Image caption बेस्ट सेलिंग लेखक डॉकिंस ने अपने भाषण में इस्लाम और कैथोलिक मतों पर बात की

उन्होंने कहा कि जब वह छह साल की थीं तो उनकी मां ने कहा था कि अगर मैंने ख़ुदा के ख़िलाफ़ कुछ कहा तो मेरी ज़बान कट कर गिर जाएगी.

एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जो महिलाएं बुर्क़ा पहनती हैं वह फ़ेमेनिस्ट नहीं हो सकतीं. याद रहे कि वे अपने विचारों के कारण बांग्लादेश से बाहर निर्वासन का जीवन गुज़ार रही हैं.

अंत में प्रसिद्ध जीव-वैज्ञानिक और लेखक डॉकिंस ने बात की और उनके निशाने पर ख़ास तौर से इस्लाम और कैथोलिक धर्म थे.

इस्लामिस्ट से बात करने के बारे में पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने कहा, "ये ऐसा ही है जैसे यह कहा जाए कि अगर आप मेरे ख़िलाफ़ बात करेंगे तो हम आपकी गर्दन उड़ा देंगे."

बहरहाल ख़बरों के मुताबिक़ फ़्रीडम फ़्रॉम रिलिजियन फ़ाउंडेशन ने फ़ैसला किया है कि वह मदर टेरेसा पर अमरीका में जारी होने वाले डाक टिकट का विरोध करेंगे.

चाहे मदर टेरेसा ने अपना सारा जीवन लोगों की सेवा में क्यों न लगा दिया हो या उन्हें नोबेल के शांति पुरस्कार क्यों न सम्मानित किया गया हो लेकिन उनका विरोध धर्म में विश्वास न करने वाले शायद सिर्फ़ इसलिए कर रहे हैं कि वह कैथोलिक थीं और उन्होंने गर्भपात अधिकार का विरोध किया था.

संबंधित समाचार