ईंधन के संसाधन पर सहमति

जॉर्ज डब्ल्यू बुश और मनमोहनसिंह
Image caption परमाणु समझौते पर बुश और मनमोहन सिंह ने हस्ताक्षर किए थे.

इस्तमाल हो चुके परमाणु ईंधन के दोबारा संसाधन पर भारत और अमरीका के बीच समझौता हो गया है.

इस समझौते के साथ ही भारत-अमरीका असैन्य परमाणु समझौते के अनुपालन के रास्ते की मुश्किलें आसान हो गई है.

महीनों तक चले गहन विचार विमर्श के बाद दोनों देशों के बीच इस समझौते पर सहमति हुई है.

समझौते के मुताबिक़ भारत अब अमरीका से इस्तमाल हो चुके परमाणु ईंधन को अपने यहां दोबारा संसाधित कर पाएगा.

भारतीय विदेशमंत्रालय के एक वक्तव्य में कहा गया है, "भारत और अमरीका ने असैन्य परमाणु सहयोग समझौते को लागू करने की दिशा में एक बड़ा क़दम उठाया है."

वक्तव्य में कहा गया है, “इस समझौते के बाद भारत इस्तमाल किए जा चुके अमरीकी परमाणु ईंधन को अंतराराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की निगरानी में दोबारा संसाधित कर सकेगा.”

अमरीकी विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया है," इस समझौते की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद अमरीकी कंपनियां भारत के तेज़ी से विकसित हो रहे असैन्य परमाणु ऊर्जा उद्योग में भागीदारी कर पाएंगी."

वर्ष 2008 में भारत और अमरीका के बीच ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे.

आठ अक्तूबर, 2008 को अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने समझौते पर हस्ताक्षर की औपचारिकता पूरी कर दी थी, जिसके बाद यह समझौता अमरीकी क़ानून बन गया था.

भारत का मानना है कि इस समझौते से देश की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी.

इस समझौते के साथ ही भारत के साथ असैनिक मकसदों के लिए परमाणु ईंधन और तकनीक के व्यापार पर तीन दशकों से लगा हुआ प्रतिबंध ख़त्म हो गया.

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