त्रिशंकु संसद क्या होती है ?

ब्रिटन का संसद भवन
Image caption इस बार के आम चुनाव में त्रिशंकु संसद आने की संभावना है

ब्रिटेन में हाल में हुए जनमत सर्वेक्षणों से संकेत मिले हैं कि इस बार के चुनाव के बाद त्रिशंकु संसद बन सकती है.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से केवल एक बार ऐसी नौबत आई है जब जनमत विभाजित रहा.

तो त्रिशंकु संसद क्या होती है और ब्रिटेन में इसका प्रचलन क्यों कम रहा है.

त्रिशंकु संसद क्या है ?

त्रिशंकु संसद वो होती है जिसमें किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिलता. यानि किसी एक पार्टी को हाउस ऑफ़ कॉमन्स या संसद के निचले सदन में आधे से अधिक सीटें नहीं मिलतीं.

इस बार संसद की सीटों में चार की बढ़ोतरी की गई है जिसके बाद कुल सीटें 650 हो गई हैं. जिसका मतलब ये हुआ कि स्पष्ट बहुमत के लिए किसी भी दल को 326 सीटें जीतनी होंगी. लेकिन अगर किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो उसे त्रिशंकु संसद कहा जाएगा.

ऐसी स्थिति में बनी सरकार को किसी भी क़ानून को पारित करने के लिए अन्य दलों के समर्थन की ज़रूरत पड़ती है.

लेकिन इसमें और कठिनाइयां भी आती हैं जैसे संसद के अध्यक्ष और उनके सहायक सांसद होते हुए भी मतदान नहीं करते.

इसके अलावा उत्तरी आयरलैंड की शिन फ़ेन पार्टी के सांसद क्योंकि ब्रिटेन की महारानी के प्रति निष्ठा की शपथ नहीं लेते इसलिए वो भी मतदान नहीं कर पाते.

त्रिशंकु संसद की स्थिति में क्या होता है ?

त्रिशंकु संसद की स्थिति में मौजूदा प्रधानमंत्री तब तक सत्ता में रहता है जब तक त्यागपत्र न दे दे. और अगर उसके दल को बहुमत नहीं भी मिला तो भी वो सत्ता में बना रह सकता है.

सन 1974 में हुए आम चुनाव के चार दिन बाद तक प्रधानमंत्री ऐडवर्ड हीथ गठबंधन की सरकार बनाने की कोशिश में सत्ता में बने रहे थे.

बहुमत न मिलने की स्थिति में कोई दल किसी छोटे दल के साथ गठजोड़ करके सत्ता में बना रह सकता है. लेकिन उसे नीतिगत समझौते करने पड़ सकते हैं और छोटे दल के सांसदों को मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ सकता है.

कुछ देशों में गठबंधन सरकार न बनाकर छोटे दलों के साथ ये समझौता कर लिया जाता है कि अगर सरकार के विरोध में मतदान हो तो वो उसका समर्थन करेंगे.

एक तरीक़ा ये भी होता है कि सदन की सबसे बड़ी पार्टी अल्पमत सरकार का गठन करे और हर विधेयक को पारित करने के लिए समर्थन जुटाए.

अगर कोई भी पार्टी इन विकल्पों के लिए तैयार न हो तो संसद भंग कर दी जाती है और दोबारा चुनाव कराए जाते हैं. लेकिन ऐसा कम ही होता है क्योंकि जल्दी जल्दी चुनाव कराना अच्छा नहीं माना जाता.

क्या ब्रिटेन में इससे पहले भी त्रिशंकु संसद बनी है ?

सन 1974 में हुए चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला.

लेबर पार्टी को 301 सीटें मिलीं जबकि कंज़र्वेटिव पार्टी को 297 सीटें.

हैरल्ड विल्सन ने अल्पमत सरकार बनाई लेकिन वो अधिक दिन नहीं चली और अक्टूबर 1974 में फिर से चुनाव कराए गए जिसमें प्रधानमंत्री को तीन सीटों का बहुमत मिल गया.

इससे पहले 1929 में भी त्रिशंकु संसद आई थी. कभी कभी संसद के कार्यकाल के बीच में भी संसद त्रिशंकु हो जाती है जैसी 1996 में कंज़र्वेटिव सरकार के कार्यकाल में उपचुनाव हार जाने से हुआ.

दुनिया के बहुत से देशों में त्रिशंकु संसद बनती है लेकिन ब्रिटेन में क्यों नहीं ?

ब्रिटेन की राजनीति पर मुख्य रूप से दो दल ही छाए रहे हैं. और इसका एक कारण यहां की निर्वाचन प्रणाली है.

इसराइल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व से सांसदों का चयन होता है. सभी मतदाता पार्टियों का चुनाव करते हैं और मतों के अनुपात में ही पार्टियों को संसद में सीटें मिलती हैं.

इससे किसी एक पार्टी के बहुमत में आने की संभावना घट जाती है. इसलिए चुनाव के बाद जिस दल को सबसे अधिक सीटें मिलती हैं वह अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाता है

लेकिन ब्रिटन में पार्टी को सीट तभी मिलती है जब उसे एक चुनाव क्षेत्र में सबसे अधिक वोट मिलें. इस प्रणाली में छोटे दलों को देश भर में भले ही हज़ारों वोट मिल जाएं लेकिन कई बार संसद में एक भी सीट नहीं मिलती. इसलिए ब्रिटन में एक पार्टी के बहुमत में आने की संभावना अधिक होती है.

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