शौचालयों से ज़्यादा मोबाइल

शौचालयों की कमी
Image caption आकड़ों के मुताबिक सिर्फ़ 31 प्रतिशत आबादी के पास सुधरी हुई सफ़ाई व्यवस्था है

संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की दूसरी बड़ी आबादी वाले देश भारत में करोड़ो लोगों के पास मोबाईल की सुविधा तो है लेकिन उससे बड़ी संख्या में लोग शौचालय जैसी मूल सुविधा से वंचित हैं.

विश्वविद्यालय ने अपनी रिपोर्ट में कुछ सिफ़ारिशों भी की हैं जिनका मक़सद है कि सफ़ाई व्यवस्था से वंचित लोगों की संख्या में कैसे कमी लाई जाए.

संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के ज़फ़र अदील ने कहा, ‘ये एक विडंबना ही है कि भारत में, जहाँ लोगों के पास इतना पैसा है कि आधी आबादी के पास मोबाइल फ़ोन की सुविधा है, वहाँ आधे लोगों के पास शौचालयों की सुविधा मौजूद नहीं है.’

भारत की 45 प्रतिशत आबादी के पास करीब 55 करोड़ मोबाइल फ़ोन हैं.

लेकिन अगर हम वर्ष 2008 के आकड़ों को देखें तो पता चलेगा कि देश की मात्र 31 प्रतिशत आबादी के पास सुधरी हुई सफ़ाई व्यवस्था मौजूद है.

मक़सद

इन सिफ़ारिशों को जारी करने का मक़सद है सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य में चिन्हित किए गए लक्ष्यों के अनुसार पानी और सफ़ाई व्यवस्था से वंचित लोगों की संख्या को आधा करना.

विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ़ के अनुसार अगर ताज़ा आंकड़ों की दिशा और रफ़्तार यही रही तो करीब एक अरब लोगों को सफ़ाई व्यवस्था पहुँचाने के वर्ष 2015 तक के लक्ष्य को पूरा नहीं किया जा पाएगा.

उधर ज़फ़र अदील का कहना है कि जो लोग इस मुद्दे पर बात नहीं करना चाहते, इसे अभद्र बताते हैं, उन्हें इस काम की बागडोर दूसरों के हाथ में दे दे देनी चाहिए क्योंकि ये लाखों बच्चों के भविष्य का सवाल है. ज़फ़र अदील ने उन लोगों की ओर भी ध्यान दिलाया जो हर साल गंदे पानी और अस्वस्थ वातावरण की वजह से मारे जाते हैं.

विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक एक शौचालय बनाने में करीब 15 हज़ार का खर्चा आता है.

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