राजमार्गों की नाकेबंदी से मणिपुर में संकट

Image caption एनएससीएन के नेता के समर्थकों ने मणिपुर के राजमार्गों की नाकेबंदी कर रखी है

भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में खाद्य सामग्री और दवाइयां पहुंचाने के लिए वायुसेना के दो यातायात विमान बुधवार को इम्फ़ाल पहुंचे.

पिछले पांच सप्ताह से इस राज्य के दो प्रमुख राजमार्गों की नागालैंड के पृथक्तावादी नेता थुइंगलेंग मुइवा के समर्थकों ने नाकेबंदी कर रखी है.

नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड भारत का सबसे लम्बे समय से सक्रिय विद्रोही संगठन है. जुलाई 1997 में एनएससीएन के आइज़ैक मुइवा गुट और भारत सरकार के बीच युद्धविराम समझौता हो गया था.

लेकिन थुइंगलेंग मुइवा को मणिपुर के भीतर अपने गांव जाने की अनुमति नहीं है. भारत सरकार को डर है कि कहीं इससे जातीय भावनाएं न भड़क उठें.

इसका परिणाम ये है कि उनके समर्थकों ने राजमार्गों की नाकेबंदी करके पूरे मणिपुर को लगभग ठप्प कर दिया है.

आपूर्ति की भारी कमी

मणिपुर की राजधानी इम्फ़ाल के मुख्य बाज़ार में लोग दूकानों और रेड़ियों को घेरे खड़े हैं जिससे ज़रूरत का सामान ख़रीद कर जमा कर सकें.

लेकिन इस समय केवल स्थानीय उत्पाद ही उपलब्ध हैं बाक़ी सभी चीज़ों की भारी क़िल्लत है.

सॉबिता देवी मईबम कहती हैं, "मैं चावल ख़रीदना चाहती हूं लेकिन दूकानदार कहते हैं कि नाकेबंदी के कारण माल कम है और क़ीमतें आकाश छू रही हैं".

लेकिन इससे भी अधिक संकट राज्य के अस्पतालों में है. शहर के एक निजी अस्पताल के सघन चिकित्सा कक्ष में एक बच्चे का इलाज चल रहा है. लेकिन जीवन रक्षक दवाइयों और ऑक्सीजन की सप्लाई कम है.

Image caption डॉ पेलिन का कहना है कि उनके अस्पताल में ऑक्सीजन की केवल एक हफ़्ते की सप्लाई बाक़ी है

शिजा अस्पताल के निदेशक डॉ केएच पेलिन कहते हैं, "इस समय हमारे पास ऑक्सीजन की केवल एक हफ़्ते की सप्लाई बची है. उसके बाद हमें कक्ष बंद करना पड़ेगा".

जीवन रेखा

राजधानी इम्फ़ाल से कुछ दूर नेशनल राजमार्ग 39 है जो राज्य की जीवन रेखा है लेकिन नाकेबंदी के कारण वीरान पड़ी है.

इस इलाक़े में कोई 20 क़बाइली विद्रोही संगठन सक्रिय हैं. इसलिए यहां सुरक्षा बलों की भारी तैनाती दिखाई देती है.

एनएससीएन नागालैंड और पड़ौसी राज्यों के नागा इलाक़ों को मिलाकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाना चाहता है जिसे मणिपुर के लोग शंका से देखते हैं.

इसलिए मणिपुर में तनाव का माहौल है और विरोध रैलियां भी निकाली गई हैं जिनमें भारत सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की गई है.

वायुसेना के अवकाश प्राप्त अधिकारी राजकुमार रोनेन्द्रजित कहते हैं, "हैरानी की बात है कि भारत जो अपने आपको एक बढ़ती विश्व शक्ति के रूप में देखता है मणिपुर आने वाले राजमार्गो की नाकेबंदी तक हटाने में समर्थ नहीं".

मुश्किल ये है कि भारत सरकार को मणिपुर की जनता की भावनाओं और नागा लोगों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बना कर रखना है.

यह कोई आसान काम नहीं. ख़ासतौर से उस क्षेत्र में जहां पृथक्तावादी हिंसा का ज़ोर है और दक्षिण पूर्व एशिया की सीमा भी जहां चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने की कोशिश कर रहा है.

मणिपुर के लेखक और समीक्षक लोकेंद्र अरम्बम कहते हैं, "पूर्वोत्तर को लेकर भारत का रवैय्या बड़ा ढीला है. लेकिन बर्मा और एशिया के अन्य क्षेत्रों में चीन के बढ़ते असर को देखते हुए भारत की चिंता समझ में आती है. यह इलाक़ा भारत की सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है".

"अगर पूर्वोत्तर राज्य अलग हो जाएं तो भारत पूरी तरह से असुरक्षित हो जाएगा".

लेकिन पूर्वोत्तर राज्य अपने आपको राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बाक़ी देश से कटा हुआ पाते हैं और देश की आर्थिक प्रगति का कोई असर यहां दिखाई नहीं देता. ऊपर से सेना की भारी उपस्थिति स्थिति को और तनावपूर्ण बनाती है.

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