'बड़े देश मिसाल क़ायम करें' - एमनेस्टी

एमनेस्टी इंटरनेशनल का लोगो
Image caption रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सरकार और माओवादी दोनों नागरिकों को अपनी प्रताड़ना का निशाना बना रहे हैं

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने वर्ष 2009 की अपनी रिपोर्ट में दुनिया की सबसे ताक़तवर सरकारों पर मानवाधिकार के मुद्दे पर ख़ुद को क़ानून से ऊपर रखने और न्याय के स्थान पर स्वार्थ को तरजीह देने का आरोप लगाया है.

अपनी वार्षिक रिपोर्ट में एमनेस्टी ने दुनिया की बीस बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी20 से कहा है कि वे मानवाधिकार के मसले पर विश्व के सामने एक मिसाल क़ायम करें. एमनेस्टी ने कहा है कि इन देशों को अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण यानि आईसीसीमें पूरी तरह से शामिल होना चाहिए.

रिपोर्ट के मुताबिक अमरीका, चीन, रुस, भारत और इंडोनेशिया आईसीसी को समर्थन ना देकर एक ग़लत संदेश भेज रहे हैं.

रिपोर्ट में 159 देशों में मानवाधिकारों के हनन का ब्यौरा है और विशेषकर श्रीलंका में गत वर्ष हुए युद्धापराधों पर चिंता व्यक्त की गई है.

भारत

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में आदिवासी और छोटे किसान सरकार के उन फ़ैसलों का लगातार विरोध कर रहे हैं जिनके चलते उनकी आजीविका ख़तरे में पड़ रही है या उन्हें ज़बरदस्ती बेदख़ल किया जा रहा है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की इस वार्षिक रिपोर्ट में माओवादियों और सरकार के बीच चल रहे संघर्ष पर भी टिप्पणी की गई है.

रिपोर्ट में लिखा है, “माओवादियों और सरकार तथा सरकार समर्थित माने जाने वाली नागरिक सेना के बीच निम्न स्तरीय संघर्ष जारी है. दोनों पक्ष नागरिकों को निशाना बना रहे हैं. देश के विभिन्न भागों में हुए बम धमाकों में सैकड़ों लोग मारे गए हैं. जवाब में सरकार ने मनमाने ढंग से लोगों को हिरासत में लिया और उन्हें प्रताड़ित किया.”

रिपोर्ट में कहा गया है कि न्याय प्रक्रिया सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने में नाकाम रही है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वर्ष 2009 में 70 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई लेकिन किसी को भी फ़ांसी पर नहीं चढ़ाया गया.

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