'स्कूल आओगे तो मारेंगे'

Image caption मिर्चपुर में एक महीने से भी अधिक समय से दलित परेशान हो रहे हैं.

हरियाणा के हिसार ज़िले के मिर्चपुर गाँव में दलितों के ख़िलाफ़ हुई हिंसा को एक महीने से ज्य़ादा का समय हो चुका है लेकिन दलित समुदाय के लोग उच्च जाति के कथित दबाव की वजह से वापस नहीं जाना चाहते.

गांव से बाहर बसाए जाने की मांग को लेकर दलित परिवार दिल्ली के कनाट प्लेस इलाक़े के वाल्मिकी मंदिर मे आसरा लिए हुए है.

दलित समुदाय और तथाकथित उच्च वर्ग के लोगों के बीच हुए संघर्ष के बाद बिखरी ज़िंदगी मे सबसे ज्यादा ख़ामियाजा बच्चों को उठाना पड़ रहा है, जो हिंसा के बाद बने माहौल मे स्कूल जाने से डरते हैं.

मनदीप हरियाणा के मिर्चपुर गाँव के सरकारी स्कूल मे एक महीने पहले तक पाँचवी कक्षा मे पढ़ती थी लेकिन 22 अप्रैल की घटना के बाद वो जब भी स्कूल गई तो डरी सहमी वापस लौटी. मनदीप अब गांव के उस स्कूल में नहीं जाना चाहती.

मनदीप रोती हुई कहती है " वो हमें स्कूल जाते वक़्त रोकते थे. वो कहते हैं कि हम तुम्हे जिंदा जला देंगे. मैं वहां नही जाना चाहती. वो हमें जला देंगे."

मनदीप अकेली नहीं है, दलित परिवारों के कई ऐसे बच्चे हैं जो इस हिंसा के बाद स्कूल नहीं जा पाए.

आठवीं कक्षा मे पढ़ने वाले आशीष कहते हैं " मै बहुत डरा हुआ हूं. वो कहते हैं कि पहली बार तो रात मे आग लगाई थी अबकी बार दिन मे आग लगा देंगे. वो कहते हैं कि अगर स्कूल मे आओगे तो मारेंगे . मै एक महीने से स्कूल नहीं गया हूँ. मेरा ये साल तो खराब ही हो गया."

धमकियाँ

वाल्मिकी मंदिर मे मौजूद दलित परिवारों का आरोप है कि मिर्चपुर मे उच्च जाति के लोग लगातार दलित परिवारों पर समझौते का दबाव बना रहे हैं और उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं.

वाल्मीकि मंदिर कैंप मे मौजूद सूरजमुखी कहती हैं " बच्चे स्कूल नहीं जा सकते, ज़मींदारों के बच्चे हमारे बच्चों के साथ लड़ते हैं."

सूरजमुखी कहती हैं. "मिर्चपुर मे हम अब मजदूरी नहीं कर सकते. हमारा परिवार बिखरा हुआ है. जहां ज़िंदा लोगों को जला दिया गया वहाँ जाकर हम क्या करेंगे. अगर हम मजदूरी नहीं कर सकते तो अपना पेट कैसे भरेंगे?"

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मिर्चपुर के दलितों की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हरियाणा सरकार और हिसार के जिला कलेक्टर को नोटिस जारी किया था.

सर्वोच्च न्यायालय में मिर्चपुर के दलितों के वकील कॉलिन गोंजाल्विस कहते हैं "हमें खुशी है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर गौर किया. हमारी माँग है कि इन परिवारों को उचित मुआवज़ा दिया जाए और अगर ज़रूरी हो तो इन्हे कहीं और बसाया जाए."

अब फ़ैसला अदालत को करना है.

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