'सबसे ज़्यादा नौकरशाही भारत में'

राजपथ
Image caption ये शिकायतें पहले भी रही हैं कि भारत में रोड़े बहुत अटकाए जाते हैं

एक ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक एशियाई देशों में से भारत में सबसे ज़्यादा नौकरशाही है.

एशियाई देशों में व्यापार और राजनीति के कई पहलुओं पर नियमित रूप से शोध करनेवाली संस्था 'पॉलिटिकल एन्ड इकॉनॉमिक रिस्क कंसलटेंसी' के सर्वेक्षण 'एशियन इंटेलिजेंस' में एशिया में नौकरशाही पर शोध किया गया है.

एशिया के 12 देशों में क़रीब 1200 मैनेजर वर्ग के प्रवासी अफसरों में किए गए इस शोध में शून्य से दस तक अंक दिए गए हैं, सबसे कम नौकरशाही के लिए सिंगापुर को 2.5 अंक मिले हैं.

इसके बाद हांगकॉंग, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान, मलेशिया, चीन, वियतनाम, फ़िलिपींस और इंडोनेशिया का नंबर है और सबसे ज़्यादा अंक, 9.4 के साथ, भारत सबसे ऊपर है.

नौकरशाही की व्याख्या

सर्वेक्षण में नौकरशाही को परिभाषित करते हुए कहा गया है, "किसी देश में सार्वजनिक क्षेत्र के सरकारी उपक्रम के कर्मचारियों के काम करने की गति, किसी काम के लिए लाइसेंस या स्वीकृति लेने के लिए ज़रूरी कागज़ी कार्रवाई, सरकारी परियोजनाओं में काम करने के लिए निजी कंपनियों द्वारा पूरी की जाने वाली तय विधि और सरकारी फैसलों को लेने और लागू करने की प्रक्रिया."

ये अलग बात है कि भारत में अक्सर नौकरशाही को भ्रष्टाचार और लाल-फ़ीताशाही का पर्याय समझा जाता है.

नौकरशाही पर किताब लिख चुके पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम के मुताबिक 1950-60 के दशकों में भारत में इतनी नौकरशाही नहीं थी.

सुब्रमण्यम कहते हैं, "राजनीतिक नियंत्रण हावी होने के बाद ही नौकरशाही में भ्रष्टाचार आया, अब उनका अपना मत मायने नहीं रखता, सब मंत्रियों और नेताओं के इशारों पर होता है."

चीन भी परेशान

इस शोध में चीन भारत से तीन पायदान नीचे है.

नौकरशाही से चीन भी परेशान है लेकिन शोध के मुताबिक वहाँ एक दलीय प्रणाली होने की वजह से चीन की सरकार के लिए सरकारी अफसरों के काम में तेज़ी लाना गठबंधन की राजनीति की दिक्क़तों से जूझ रहे भारत की अपेक्षा आसान है.

इसी वजह से चीन में विदेशी निवेशकों को कागज़ी कार्रवाई और नियम पूरे करने में कम दिक्कत आती है.

शोध में सिंगापुर की नौकरशाही को सबसे कार्यकुशल बताया गया है.

सर्वेक्षण के अनुसार, "सिंगापुर में सरकारी अफसर तेज़ी से काम करते हैं, नियमों को लागू किया जाता है, आम जनता के लिए जानकारी पाना आसान है और काम के तौर तरीकों में पारदर्शिता है."

जब टीएसआर सुब्रमण्यम से पूछा कि भारत में सिंगापुर की तरह कामकाज कैसे हो सकता है, तो उन्होंने कहा, "हमारे राजनीतिज्ञ करना चाहें तो पाँच साल में व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता है लेकिन मौजूदा स्थिति उनके लिए अनुकूल है इसलिए वो बदलाव नहीं करते."

सुब्रमण्यम के मुताबिक बदलाव लाने के लिए तो क्रांति की ज़रूरत होगी.

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