तेल के कुँए ख़ुशहाली लाएँगे?

घाना
Image caption घाना में तेल के भंडार मिले हैं और अब उनका दोहन होना है

तीन साल पहले घाना के तटवर्ती शहर टाकोराडी के समुद्र में तेल के विशाल भंडार का पता लगा तो कहा जाने लगा कि अब घाना की आर्थिक प्रगति को नहीं रोका जा सकता.

राजनेता और उद्योगपति लोगों को बता रहे हैं कि ये तेल उनके जीवन में ख़ुशहाली लाएगा.

लेकिन प्रकृति की इस सौग़ात से ख़ुश होने की बजाए यहाँ के लोग आशंकाओं में घिर गए हैं.

बहुत सारे लोग मानते हैं कि असली फ़ायदा सिर्फ़ राजनेताओं, उद्योगपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होगा. आम लोगों के लिए ये तेल सौग़ात से ज़्यादा अभिशाप लाएगा.

आख़िर घाना के लोगों को ऐसा क्यों लगता है?

उनके सामने पहले तो ख़ुद घाना का उदाहरण है जहाँ की खदानों में प्रचुर सोना होने के बावजूद आम लोगों की आर्थिक स्थिति में कोई बेहतरी नहीं आई है.

दूसरा और ज़्यादा डरावना उदाहरण पड़ोसी देश नाइजीरिया का है.

नाइजीरिया का उदाहरण

नाइजीरिया के दक्षिण में नाइजर डेलटा में जब तेल होने का पता चला था तो उसे देश की प्रगति की गारंटी बताया गया था.

जब वहाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तेल का दोहन शुरू किया तो जैसे किसी ने उपजाऊ ज़मीन को ज़हर से सींच दिया हो.

लोगों को अपने गाँव छोड़ने पड़े क्योंकि तेल कारख़ानों से निकलने वाले कचरे और दुर्घटनावश बह जाने वाले तेल के कारण फ़सलें चौपट होने लगीं.

तेल से होने वाली आमदनी नाइजर डेल्टा से निकलकर कुछ ख़ास जेबों तक पहुँचने लगी.

स्थानीय लोगों की बेचैनी बढ़ी और बरसों तक उन्होंने पर्यावरण कार्यकर्ता केन सारो वीवा के नेतृत्व में तेल की आय का हिस्सा स्थानीय लोगों की बेहतरी में लगाने की माँग की.

लेकिन फिर नाइजीरिया की सरकार ने सारो वीवा और आठ कार्यकर्ताओं को फाँसी पर चढ़ा दिया. इस बीच हिंसा का तांडव जारी रहा.

वर्ष 2003 में नाइजीरिया में चुनाव हुए जिनमें ज़बरदस्त गड़बड़ी किए जाने का आरोप लगा.

उसके बाद स्थानीय नौजवानों ने हथियार उठा लिए.

नाइजर डेल्टा मुक्ति आंदोलन नाम का एक संगठन विदेशी कंपनियों और तेल के कुँओं या सप्लाई लाइनों पर हमले करने लगा.

आख़िरकार जो तेल नाइजर डेल्टा के लोगों तक ख़ुशहाली पहुँचाने वाला था, वो उनके लिए एक दारुण अभिशाप बन गया. तेल की धार रक्त की धार में बदल गई और ये अब भी उस इलाक़े में लोगों की परेशानियों का कारण बनी हुई है.

नाईजर डेल्टा में बीबीसी संवाददाता फ़िदालिस म्बाह इस उथल पुथल के गवाह रहे हैं. वो अगले दस साल में इस शहर पर आने वाली मुसीबतों की ओर इशारा करते हैं.

भरोसा नहीं

वो कहते हैं कि अगले दस साल में टाकोराडी के ग़रीब लोगों को शहर छोड़ देना पड़ेगा क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिकारियों के आने से किराए बढ़ेंगे और स्थानीय लोग उसे वहन नहीं कर पाएँगे.

टाकोराडी में स्काई मीडिया कंपनी से जुड़े फ़िलिपोस ईबोन्स पहले इस मुद्दे पर बात करने को तैयार नहीं हुए. फिर उन्होंने कहा, “तेल मिलने की ख़बर से मैं बहुत उत्साहित नहीं हूँ. हम इतने बरसों से धरती से सोना और दूसरे खनिज पदार्थ निकाल रहे हैं. जब हमारी स्थिति पर उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा तो ये तेल क्या करेगा? ”

फ़िलिपोस कहते हैं कि घाना के लोग इतनी आशंकाओं में इसलिए घिरे हैं क्योंकि उनको अपने नेताओं पर कोई भरोसा नहीं है.

लेकिन उद्योगपति एडवर्ड फ़िलिप्स समझाते हैं कि लोगों को इतना अधीर नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा, “बूँद बूँद करके ही सही लेकिन तेल की आमदनी का फ़ायदा आम लोगों तक पहुँचेगा.”

फ़िलिप्स का कहना था कि घाना में सोने की खदानें विदेशी कंपनियों के नियंत्रण में हैं इसलिए पूरा मुनाफ़ा बाहर चला जाता है. लोग दक्षिण अफ़्रीक़ा से तुलना करते हैं जहाँ सोने की खदानों में कोई बाहरी कंपनी नहीं है, इसलिए पूरी आय देश के भीतर ही रहती है.

फ़िदालिस म्बाह कहते हैं कॉमर्शियल ड्रिलिंग शुरू होते ही जैसा नाइजर डेल्टा में हुआ वैसा ही टाकोराडी में भी होगा.

वे कहते हैं, "पर्यावरण बरबाद होगा और सरकार कुछ नहीं करेगी क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ टैक्स देती हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हताश लोग पहले अर्ज़ी वग़ैहर देंगे और आख़िरकार हथियार उठाएँगे."

अगर ऐसा हुआ तो तेल का ये भंडार घाना के आम लोगों के लिए अभिशाप बन जाएगा.

संबंधित समाचार