अफ़्रीका डायरी-3

अफ़्रीका
Image caption अफ़्रीका के छात्र पूछते हैं कि पश्चिमी देशों में पूरे अफ़्रीका को एक ही चश्मे से क्यों देखा जाता है

“मैं ये सवाल बीबीसी से ही पूछता हूँ. क्या बीबीसी के लिए अफ़्रीका में ग़रीबी, नरसंहार, फ़ौजी तख़्तापलट, एड्स और जातीय हिंसा के अलावा और कुछ नहीं है?”

घाना के केप कोस्ट विश्वविद्यालय में शांति और विकास विषय में डिग्री की पढ़ाई कर रहे बिलिगू फ़्रांसिस ने ये सवाल पूछा. इस सवाल में तपे हुए चेहरे और तेज़ पीले रंग की आँखों वाले बिलिगू का आत्मविश्वास झलकता था. और थोड़ा ग़ुस्सा भी.

एक तरह से इस सवाल के लिए मैं तैयार था. पश्चिम अफ़्रीका के आइवरी कोस्ट से होते हुए घाना पहुँचने तक इतना तो महसूस हो ही गया था कि आत्मसम्मान से भरे अफ़्रीकी लोग बाहरी दुनिया में अफ़्रीका की धूमिल छवि को लेकर बेचैन रहते हैं.

आसपास जुट आए छात्रों के चेहरों पर इस सवाल के प्रति समर्थन मैं साफ़ पढ़ रहा था.

छात्रों ने मुझसे अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं की बात की. उस दौर की बात की जब यूरोपीय व्यापारी अफ़्रीकी लोगों को लाखों की संख्या में क़ैद कर अटलांटिक पार ले जाकर ग़ुलामों की मंडियों में बेच देते थे. उन्होंने हैती, लाइबेरिया, जॉर्ज बुश और बराक ओबामा की बात की और अफ़्रीका के भविष्य के बारे में बात की.

Image caption अफ़्रीकी लोग बाहरी दुनिया में अफ़्रीका की धूमिल छवि को लेकर बेचैन रहते हैं

आत्मनिर्भरता की चाह

धर्म और मानवीय मूल्य विषय की पढ़ाई कर रहे गेब्रियल आपिया ने कहा औपनिवेशिक काल से ही अफ़्रीकी आदमी को ऐसी ट्रेनिंग दी गई है जिससे वो सोचता है कि यूरोप और अमरीका की मदद के बिना वो कुछ नहीं कर पाएगा.

केप कोस्ट विश्वविद्यालय काफ़ी बड़े हरे-भरे इलाक़े में फैला हुआ है. विश्वविद्यालय के गेट से ही चौड़ी सड़क के दोनों ओर ताड़ के सुंदर पेड़, ख़ूबसूरत घास के मैदान, फव्वारे और तरतीबवार लगे फूल दिखते हैं. कहीं कोई पोस्टर नहीं और न नारों से पटी दीवारें और न कहीं नवधनाढ्य परिवारों के बच्चों की चमकती कारों की क़तारें.

यहाँ अंतरराष्ट्रीय राजनीति, विज्ञान, कॉमर्स के साथ साथ धर्म और मानवीय मूल्य जैसे विषयों पर डिग्रियाँ दी जाती हैं.

भाषा पर पकड़, अपने विचारों को सधे हुए तरीक़े से प्रस्तुत करने की कला और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय विषयों की गहरी जानकारी और धारदार राजनीतिक चेतना– मैंने पाया कि यहाँ के छात्र केम्ब्रिज या हार्वर्ड जैसे संस्थानों में पढ़ने वालों से किसी भी मायने में पीछे नहीं हैं.

छात्र पूछते हैं कि पश्चिमी देशों में पूरे अफ़्रीका को एक ही चश्मे से क्यों देखा जाता है. अफ़्रीका एक विशाल महाद्वीप है कोई एक देश नहीं. सवाल वास्तव में वाजिब है. अगर कम्बोडिया या बर्मा में उथल पुथल होती है तो क्या पूरे भारत या एशियाई लोगों को उसका ज़िम्मेदार माना जा सकता है? केप कोस्ट यूनिवर्सिटी के छात्र और अफ़्रीका के लोग यही जानना चाहते हैं.

अफ़्रीक़ा का यही सवाल है.

संबंधित समाचार