अबू हमज़ा के प्रत्यर्पण पर रोक

अबू हमज़ा

यूरोपीय मानवाधिकार कोर्ट ने कट्टरवादी मौलवी अबू हमज़ा को अमरीका प्रत्यर्पित करने पर रोक लगा दी है. उन पर आतंकवाद के सिलसिले में आरोप लगे हुए हैं.

मिस्र में पैदा हुए 47 वर्षीय अबू हमज़ा अल मसरी एक ब्रितानी महिला से शादी के बाद 1981 में ब्रिटेन के नागरिक बन गए थे.

वे लंदन के उत्तरी हिस्से फ़िंसबरी पार्क की मस्जिद के इमाम थे मगर उनपर राजनीतिक और व्यक्तिगत भाषण देने का आरोप लगाया गया और 2003 में उनके भाषण देने पर पाबंदी लगा दी गई थी.

वर्ष 2004 में अमरीका ने उनपर 'आतंकवाद' से जुड़े 11 आरोप लगाए. अमरीका चाहता है कि ब्रिटेन उन्हें प्रत्यर्पित करे.

हत्या और नसली नफ़रत फैलाने के आरोप में अबू हमज़ा ब्रिटेन में सात साल की जेल की सज़ा काट रहे हैं.

हमज़ा की शिकायत

अमरीका के आरोप

अबू हमज़ा- लोगों का अपहरण और आतंकवादी ट्रेनिंग शिविर शुरु करने की कोशिश

हारून अस्वत- ट्रेनिंग शिविर के सिलसिले में कथित सह अभियुक्त

बाबर अहमद- तालेबान का समर्थन, कट्टरवादी वेबसाइटों के ज़रिए पैसा जुटाना

सईद अहसान- कथित सह अभियुक्त

अबू हमज़ा और तीन अन्य ब्रितानी पुरुषों ने शिकायत की थी कि अगर अमरीका में उन्हें दोषी करार दिया जाता है तो उन्हें लंबे समय की सज़ा हो सकती है.

ब्रितानी अदालतें पहले ही प्रत्यर्पण को अपनी मंज़ूरी दे चुकी हैं लेकिन अब यूरोपीय मानवाधिकार कोर्ट के फ़ैसले के बाद इसमें देरी होगी.

ब्रितानी गृह मंत्रालय का कहना है कि तब तक सभी लोग हिरासत में रहेंगे.

अमरीका के आग्रह पर ब्रिटेन में बसे कट्टर मुस्लिम नेता को गुरूवार सुबह गिरफ़्तार किया गया.

अबू हमज़ा के अलावा बाबर अहमद, सईद तलहा अहसान और हारून राशिद अस्वत का प्रत्यर्पण हो सकता है.

इन मामलों में अमरीका ने संकेत दिया है कि सभी लोगों को लंबी अवधि की सज़ा का सामना कर पड़ सकता है.

इसके बाद ब्रिटेन में सभी अभियुक्तों ने अर्ज़ी दी थी कि सज़ा की अवधि और अमरीकी जेल में जिस हालात में उन्हें रख जाएगा उससे उनके मानवाधिकारों का हनन होता है.

यूरोपीय कोर्ट का कहना है कि अमरीका में जेल के हालात और सज़ा की अवधि का क्या असर होगा, इस बारे में जज विस्तृत जानकारी और तर्क करना चाहते हैं.

अबू हमज़ा के मामले में कोर्ट ने कहा कि उनके सिलसिले में अमरीकी जेल की परिस्थितियों का मुद्दा ज़्यादा मायने नहीं रखता क्योंकि विकलांगता की वजह से वे उस विशेष जेल में थोड़े समय के लिए ही रहेंगे.

जबकि बाकी के लोगों को एकांतवास में रखा जा सकता है. कुछ आलोचक इसे मनोवैज्ञानिक प्रताड़ना मानते हैं.

यूरोपीय कोर्ट ने कहा है कि इस बात पर और क़ानूनी बहस होनी चाहिए कि जेल में पैरोल के बगैर ज़िंदगी अभियुक्तों के मानवाधिकारों का हनन है या नहीं.

ब्रिटेन सरकार को दो सितंबर तक कोर्ट को अपनी दलीलें पेश करनी हैं कि क्यों उसे चारो लोगों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति दी जानी चाहिए.

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