'ब्रिटिश मुसलमानों को बांटना चाहते हैं'

Image caption अफ़ग़ानिस्तान में तैनात ब्रिटिश सैनिक जिन्हे एक अफ़ग़ान सैनिक ने मार डाला था

“मेरा नाम तालिब हुसैन है और मैं ग़ज़नी प्रांत के जघूरी ज़िले का रहने वाला हूं”.

ये वो अफ़ग़ान सैनिक है जिसने कुछ दिन पहले अफ़ग़ानिस्तान में ब्रिटिश सैनिकों को मार डाला था.

बीबीसी के सहायक दाउद आज़मी को तालिबान के ज़रिए इस सैनिक से टेलीफ़ोन पर बात करने का अवसर मिला जिससे उसकी पृष्ठभूमि और मनस्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है.

तालिब हुसैन ने बताया, “मेरी उम्र 21 साल है और मैं हज़ारा समुदाय का शिया हूं. मैं एक साल पहले अफ़ग़ान सेना में शामिल हुआ था. मैंने छह महीने तक काबुल की एक अकादमी में प्रशिक्षण लिया और उसके बाद मुझे हेलमंद भेज दिया गया”.

“मैं काम की तलाश में दो साल ईरान में भी रहा लेकिन एक साल पहले मुझे वहां से निकाल दिया गया. ईरान जाने से पहले मैं ग़ज़नी के एक स्कूल में पढ़ता था. ईरान से लौटने के बाद यहां करने को कुछ नहीं था इसलिए मैं सेना में भर्ती हो गया”.

तालिब हुसैन ने कहा, “जब मैं सेना में भर्ती हुआ तो मुझे बताया गया कि पाकिस्तानी हमारे देश को ख़त्म करने आ रहे हैं. लेकिन मैंने तो यहां कोई पाकिस्तानी नहीं देखा. ये सब यहीं के लोग हैं जो लड़ाई लड़ रहे हैं. हेलमंद के सभी लोग मुजाहिद हैं.”

हुसैन का कहना था कि जब उन्हे पूरी स्थिति समझ में आई तो उनकी आत्मा ब्रिटिश सैनिकों के साथ काम करने के लिए तैयार नहीं हुई.

“ब्रिटिश सैनिक आत्मघाती हमलों में शामिल होते हैं. वो मुसलमानों को बांटना चाहते हैं. वो अफ़ग़ानिस्तान का पुनर्निर्माण करने या उसे सुरक्षित बनाने के लिए नहीं आए हैं”.

तालिब हुसैन ने कहा, “ब्रिटिश सैनिक बच्चों की हत्या करते हैं. मैंने अपनी आंखो से उन्हे एक पांच साल की बच्ची को गोली मारते देखा.”

हुसैन से बात कर रहे दाउद आज़मी से उसने सवाल किया, “अगर आपकी आंखों के सामने ऐसा हो तो आप पर क्या बीतेगी. उनमें कोई दया नहीं है. इसीलिए मैं मुजाहिदीन के साथ शामिल हो गया.”

जब उससे पूछा गया कि क्या तालिबान ने उसे ब्रिटिश सैनिकों को मारने का आदेश दिया था तो उसने कहा, “ब्रिटिश सैनिकों को मारने की योजना मेरी अपनी थी. इससे पहले मेरा तालिबान के साथ कोई सम्पर्क नही था क्योंकि तब तक मैं उसके ख़िलाफ़ लड़ रहा था.”

हुसैन ने बताया कि ब्रिटिश सैनिकों को मारने के बाद वो अपनी वर्दी पहने हुए सैनिक अड्डे से भाग निकला और तालिबान के पास पहुंच गया.

“वो मेरा पूरा ख़्याल रख रहे हैं. मैं इस समय हेलमंद प्रांत के नाद-ए-अली ज़िले में हूं और मरते दम तक मुजाहिदीन के साथ रहूंगा”.

उसने बताया कि वो कभी पाकिस्तान नहीं गया.

अपने परिवार के बारे में वो बताता है, “एक पारिवारिक विवाद के कारण मेरे पिता ने मुझे घर से निकाल दिया था. मैं एक साल से ग़ज़नी नहीं गया हूं और अपने परिवार वालों के बारे में मुझे कुछ पता नहीं है”.

“मैंने सोचा कि इस दुनिया में तो मेरा जीवन सुखी नहीं हो सका. न मेरा परिवार है और न कोई मित्र. मैंने सोचा कि अगली दुनिया में तो मुझे बेहतर ज़िंदगी मिले.”

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