बहुविवाह प्रथा का विरोध

मलेशिया में बहुविवाह प्रथा
Image caption सर्वे में पाया गया है कि मलेशिया में पांच फ़ीसदी शादियां बहुविवाह की श्रेणी में आती हैं.

मलेशिया में बहुविवाह पर हुआ एक अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि पहली पत्नी और बच्चे मर्दों के दूसरे विवाह का ज़ोरदार विरोध करते हैं क्योंकि दूसरे विवाह के बाद उन्हें पुरुष पर्याप्त समय और धन नहीं देते हैं.

मुसलमान-बहुल मलेशिया में बहुविवाह को क़ानूनी दर्ज़ा मिला हुआ है लेकिन ये एक विषय है जिस पर ख़ूब बहस होती है.

अध्ययन से जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना है कि मलेशिया में होने वाली शादियों में से हर वर्ष पांच प्रतिशत शादियां बहुविवाह की श्रेणी में आती हैं.

मलेशिया के एक विश्वविद्यालय और ग़ैर-सरकारी संस्था ‘सिस्टर्स इन इस्लाम’ के अध्ययन से मिली प्रारंभिक जानकारियां नाख़ुश शादियों की तस्वीर उभारती हैं.

सर्वेक्षण में पाया गया कि क़रीब 70 फ़ीसदी पहली पत्नियां और 90 प्रतिशत बच्चे बहुविवाह का विरोध करते हैं.

दिक्कतें

हालांकि तकनीकी तौर पर दूसरा विवाह करने से पहले मर्द को पहली पत्नी से इजाज़त लेनी होती है, लेकिन कई महिलाओं ने बताया कि उनसे इस बारे में कभी नहीं पूछा गया और वे इस कारण काफ़ी अपमानित महसूस करती हैं.

बीबीसी की इंडोनेशियाई सेवा को ‘सिस्टर्स इन इस्लाम’ की इरेना इदरिस ने बताया, “दोबारा शादी करने वाले मर्दों की पहली पत्नियों पर बच्चों के पालन-पोषण का बोझ पड़ जाता है. पति उनका ध्यान नहीं रखते क्योंकि वे दूसरे परिवार में व्यस्त हो जाते हैं. इस तरह पहली पत्नी को कष्ट झेलने पड़ते हैं. ”

बहुविवाह प्रथा के हिमायती कहते हैं कि इससे व्यभिचार कम होता है और विधवाओं के विवाह की उम्मीद बढ़ती है. लेकिन अध्ययन के मुताबिक इससे उलट सिर्फ़ मर्दों को ही फ़ायदा होता दिखता है.

बहुविवाह प्रथा के विरोधियों की शिकायत है कि इसका मक़सद विधवाओं और लावारिस बच्चों की सुरक्षा और सहायता करना था लेकिन अब ये प्रथा अपने मूल इस्लामी उद्देश्यों से भटक गई है.

संबंधित समाचार