'आप्रवासियों के मुद्दे पर मतभेद नहीं'

कैमरन
Image caption कैमरन सरकार आप्रवासियो के बारे में नई नीति को अप्रैल से लागू करेगी

ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है कि यूरोप से बाहर के देशों से ब्रिटेन आने वाले लोगों की संख्या सीमित करने को लेकर उनके मंत्रिमंडल में कोई मतभेद नहीं है.

मतभेद की बात मीडिया में वाणिज्य मंत्री विंस केबल के उस बयान के बाद सामने आई थी जिसमें उन्होंने आप्रवासियों की संख्या पर कड़े नियंत्रण के बजाय एक लचीली व्यवस्था की हिमायत की थी.

बीबीसी से बातचीत में प्रधानमंत्री ने कहा कि केबल किसी मुद्दे पर अपनी बात सामने रखते हैं तो उसमें कुछ भी बुरा नहीं है.

उल्लेखनीय कैमरन ब्रिटेन में प्रवासियों की संख्या को 1990 के दशक के स्तर पर लाने का इरादा रखते हैं.

विस्तृत विचार-विमर्श के बाद प्रवासियों की संख्या पर नियंत्रण अगले साल अप्रैल से लागू होगा.

प्रधानमंत्री कैमरन ने बीबीसी रेडियो 4 से बातचीत में आप्रवासियों की सालाना संख्या निश्चित किए जाने को सही बताते हुए कहा, "मैं चाहता हूँ और सरकार भी चाहती है कि ब्रिटेन में आने वाले आप्रवासियों की सालाना संख्या हज़ारों में हो, न कि लाखों में जैसा कि पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है."

अपनी राय रखने का हक़

अपने ही मंत्रिमंडल के एक सदस्य की आपत्तियों के बारे में कैमरन ने कहा, "वाणिज्य मंत्री यदि मुक्त और खुले बाज़ार के फ़ायदों पर ज़ोर देते हैं तो इसमें ग़लत क्या है. विंस ने यही तो किया है. लेकिन हम इन विषयों पर फ़ैसला मंत्रिमंडल की बैठक में विचार-विमर्श के बाद करते हैं."

उल्लेखनीय है कि कैमरन की सरकार टोरी-लिबरल डेमोक्रेट्स गठजोड़ सरकार है. कैमरन टोरी पार्टी के नेता हैं, जबकि विंस केबल लिबरल डेमोक्रेट्स के वरिष्ठ नेता हैं. और, सरकार के गठन से पहले आप्रवासियों की संख्या को निश्चित करने के मुद्दे पर दोनों पार्टियाँ दो ध्रुवों पर रही है.

आप्रवासियों की संख्या के बारे में अपनी कड़ी नीति को लेकर कैमरन को भारत सरकार की भी नाराज़गी झेलनी पड़ रही है क्योंकि नए नियम लागू होने पर भारतीय पेशेवर लोगों के लिए ब्रिटेन में आकर काम करना मुश्किल हो जाएगा.

अभी आप्रवासियों की सालाना संख्या स्थाई तौर पर निश्चित नहीं की गई है, और भारत यात्रा पर गए कैमरन ने कहा है कि प्रस्तावित नीति के बारे में भारत सरकार की भी राय ली जाएगी.

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ब्रिटेन फ़र्ज़ी कॉलेजों और उनमें नाम लिखाने वाले फ़र्ज़ी छात्रों की समस्या से छुटकारा पाएगा, लेकिन उसे प्रतिभाशाली चीनी और भारतीय छात्रों की ज़रूरत है.

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