स्वच्छ पानी बना मानवाधिकार,प्रस्ताव बाध्य नहीं

संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि स्वच्छ पानी और सफ़ाई की सुविधा तक पहुँच अब हर व्यक्ति का मूल मानवाधिकार होगा.

इस प्रस्ताव के पक्ष में 122 देश थे जबकि 41 देशों के प्रतिनिधि ग़ैर हाज़िर रहे. किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया और प्रस्ताव पारित हो गया. हालांकि ये प्रस्ताव बाध्य नहीं होगा.

कनाडा, अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और बोस्तवाना ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. वहीं चीन, रूस, जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन और ब्राज़ील ने प्रस्ताव का समर्थन किया.भारत औऱ पाकिस्तान ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है.

जो देश मतदान में शामिल नहीं हुए उन्होंने कहा है कि इस प्रस्ताव से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की उस प्रक्रिया पर सवाल उठ जाएँगे जिसमें पानी के अधिकार को लेकर पहले से ही एक राय बनाने की कोशिश की जा रही है.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक पांच साल से कम उम्र के करीब 15 लाख बच्चे हर साल पानी और साफ़-सफ़ाई की कमी के कारण मर जाते हैं.

प्रस्ताव के मसौदे में कहा गया है कि 88 करोड़ 40 लाख लोगों को पीने के लिए साफ़ पानी नहीं मिलता और करीब 2.6 अरब लोगों को शौचालय व्यवस्था नहीं मिलती.

सबको मिले साफ़ पानी

मसौदे में कहा गया है कि पीने का स्वच्छ पानी और साफ़-सफ़ाई की सुविधा अब मानवाधिकार होगा जो ज़िंदगी जीने के हक़ का पूरा आनंद उठाने के लिए ज़रूरी है.

प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया गया है कि लोगों को स्वच्छ, सुरक्षित पानी और साफ़-सफ़ाई की सुविधा मुहैया कराने के लिए वो और काम करे.

पुर्तगाल के वकील अगले साल जीनिवा में मानवाधिकार परिषद को रिपोर्ट देने वाले हैं जिसमें वे पानी और साफ़ सफ़ाई व्यवस्था को लेकर देशों के फ़र्ज़ के बारे में बताएँगे.

अमरीका के प्रतिनिधि जॉन सामिस ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को सभी देशों का समर्थन हासिल नहीं है और जीनिवा में पहले से इस मुद्दे पर चल रहे काम पर असर पड़ सकता है.

बीबीसी संवाददाता बारब्रा प्लेट ने कहा है कि कुछ देशों का मत है कि प्रस्ताव में ये बात स्पष्ट नहीं है कि इस नए मानवाधिकार का दायरा क्या होगा.

संबंधित समाचार