ऑस्ट्रेलिया में चुनावी दंगल

टोनी एबट और जूलिया गिलार्ड
Image caption ऑस्ट्रेलिया के चुनाव अभियान में राजनेताओं के पुतले भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं

ऑस्ट्रेलिया में 21 अगस्त को आम चुनाव होने वाले हैं और मुख्य मुक़ाबला है सत्ताधारी ऑस्ट्रेलियन लेबर पार्टी और विपक्षी लिबरल पार्टी ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया के बीच.

इन दो दलों के अलावा दो अन्य छोटी पार्टियां भी हैं द ऑस्ट्रेलियन ग्रीन्स और द नेशनल पार्टी ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया.

ग्रीन्स आमतौर पर लेबर पार्टी का समर्थन करते रहे हैं जबकि द नेशनल्स, लिबरल पार्टी के सहयोगी हैं.

लेबर पार्टी की नींव मज़दूर संघों ने 19 वीं सदी के अंतिम दशक में रखी थी. लिबरल पार्टी का नाम भले ही लिबरल यानि उदारवादी हो लेकिन ये यहाँ की मुख्य दक्षिणपंथी पार्टी मानी जाती है.

जहाँ तक नेशनल्स पार्टी का सवाल है वो भी दक्षिणपंथी मानी जाती है हालांकि उसका प्रभाव ग्रामीण इलाकों में अधिक है.

ग्रीन्स पर्यावरण के मुद्दों पर केन्द्रित है और सिडनी और मेलबर्न जैसे बड़े शहरों में काफ़ी लोकप्रिय है.

लेबर और लिबरल में अंतर

विचारधारा से परे व्यावहारिक स्तर पर क्या दोनों पार्टियों के बीच आज भी अंतर है ?

Image caption प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड एक मंझी हुई राजनेता हैं

वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनीतिक टीकाकर डॉ नोर्मन एब्योरेंसन कहते हैं, "यहाँ दो मुख्य पार्टियाँ है, लिबरल जिसकी विचारधारा थोड़ी दक्षिणपंथी है और लेबर जिसका रुझान वामपंथ की तरफ़ है. लेकिन जैसा कि कई और देशों में हुआ है पिछले 30 सालों में दोनों की आर्थिक नीतियों में कई समानताएं देखी गई हैं."

"लेबर एक समय समाजवादी पार्टी होने का दावा करती थी लेकिन 70 के दशक के अंत तक उसके संविधान में परिवर्तन किया गया और जब 1983 में वह सत्ता में आई तो उसने व्यापार के पक्ष में ऐसी आर्थिक नीतियाँ अपनाई जिनकी अपेक्षा आप लिबरल पार्टी से करते."

उम्मीदवार

प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड और लिबरल पार्टी के नेता टोनी एबट दोनों ही मंझे हुए खिलाड़ी हैं.

जूलिया गिलार्ड एक बेहतरीन सांसद मानी जाती है और केविन रड की सरकार में सबसे प्रभावशाली मंत्रियों में से एक थीं.

जूलिया न केवल ऑस्ट्रेलिया की उप प्रधानमंत्री थी बल्कि उन्हें शिक्षा, रोज़गार और समाजिक समावेश जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय भी सौंपे गए थे.

जूलिया गिलार्ड पेशे से वकील हैं और अपने कॉलेज के दिनों में वो ऑस्ट्रेलियाई छात्र संघ से जुड़ी थीं.

वो पहली बार 1998 में मेलबर्न के लेलर क्षेत्र से सांसद चुनी गईं थीं. तब से लेकर 2007 तक लेबर पार्टी विपक्ष में रही और जूलिया गिलार्ड पार्टी के दिग्गज नेताओं में से एक गिनी जाने लगीं.

जब 2007 में लेबर पार्टी चुनाव जीती तो जूलिया गिलार्ड को उप प्रधानमंत्री बनाया गया. इस साल 24 जून को वो ऑस्ट्रेलिया की 27 वीं और पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं.

Image caption टोनी एबट विपक्षी लिबरल पार्टी ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया के नेता हैं

दूसरी ओर हैं टोनी एबट जो कभी पादरी बनने की राह पर थे. वो गर्भपात के सख़्त ख़िलाफ़ हैं और कहते हैं कि समलैंगिकता एक ख़तरा है.

उन्होंने जलवायु परिवर्तन को भी ख़ारिज कर दिया था.

एबट 52 साल के हैं और अपने आपको एक चुस्त और तंदरुस्त व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं. इस साल उन्होने एक लम्बी और कठिन दौड़ में भी भाग लिया था.

जॉन हॉवर्ड की सरकार में वो एक वरिष्ठ मंत्री थे और उन्हे स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे अहम मंत्रालयों का भार सौंपा गया था.

मुख्य चुनावी मुद्दे

ऑस्ट्रेलिया के चुनाव में शरणार्थियों की समस्या, आप्रवासन, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य सेवा जैसे विषय चर्चा में रहते हैं और अर्थव्यवस्था एक प्रमुख विषय होता ही है.

लेकिन यहाँ कुछ स्थानीय मुद्दे भी चुनाव में महत्त्वपूर्ण रहेंगे क्योंकि टक्कर कांटे की है और कुछ सीटों और कुछ मतों से ही परिणाम पर असर पड़ सकता सकता है.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक डॉ रिक कुहन कहते है, “ये चुनाव सौंदर्य प्रतियोगिता की तरह हो रहे हैं कि कौन सा उम्मीदवार लोगों को कम बनावटी लगता है. और इसके लिए आप लोगों को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते."

"दोनों पार्टियों के बीच कुछ मुद्दों पर अंतर हो सकता है लेकिन मूल रूप से प्रमुख मुद्दों पर दोनों की नीतियों में बहुत फ़र्क नहीं है इसलिए जनता के पास कोई विकल्प ही नहीं है.”

मतदाता जो भी फैसला करे, लेकिन रोचक बात ये है की आज से एक साल पहले ये अनुमान लगाना मुश्किल था की जूलिया गिलार्ड या टोनी एबट में से कोई इस देश का प्रधानमंत्री बन सकता है.

क्योंकि एक तरफ केविन रड बहुत लोकप्रिय थे तो दूसरी तरफ़ लिबरल पार्टी के अध्यक्ष एबट नहीं बल्कि मैल्कम टर्नबुल थे. शायद इसी को राजनीति कहते हैं.

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