बाढ़, व्हाइट हाउस और ग्राउंड ज़ीरो

पाकिस्तान में बाढ़ पीड़ित
Image caption अमरीकी अधिकारी लगातार बताते रहते हैं कि उन्होंने पाकिस्तान की कितनी मदद की है या कर रहे हैं.

पाकिस्तान में बाढ़ से हो रही तबाही का असर अमरीका में भी महसूस किया जा रहा है, कम से कम अमरीकी प्रशासन में ख़ास तौर से.

सबसे अधिक हरकत में है इसका विदेश मंत्रालय. इस मंत्रालय से मेरे मेल बॉक्स में रोज़ औसतन तीन मेल आते हैं और इनमें अधिकतर इस बात की जानकारी दी जाती है कि अमरीका पाकिस्तान में बाढ़ से पीड़ित लोगों को कितनी मदद भेज रहा है.

विदेश मंत्री हिलरी क्लिंटन से लेकर मंत्रालय के कई जूनियर अधिकारियों ने अलग-अलग प्रेस कांफ़्रेंस करके भी इसकी जानकारी दी है. और मेरा अनुमान है कि यह सिलिसिला अभी कई दिनों तक जारी रहेगा.

एक अधिकारी ने मुझे बताया कि ओबामा प्रशासन पाकिस्तान की सहायता दृढ़ विश्वास के साथ कर रहा है. उसने स्वीकार किया कि यह पाकिस्तानियों के दिल और दिमाग़ को जीतने का बहुत बढ़िया मौक़ा है.

ऐसा मालूम होता है कि मदद करना ही काफ़ी नहीं मदद करके बार-बार बताना भी ज़रूरी होता है.

अमरीका में एशियाई

Image caption ग्राउंड ज़ीरो पर मस्जिद का विरोध तो हो रहा है लेकिन बहुमत को इससे ऐतराज़ नहीं है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि अमरीका आमतौर से दुनिया भर में पसंद नहीं किया जाता. मेरे कुछ ऐसे दोस्त हैं जिन्होंने सिद्धांतों के आधार पर अमरीका न आने की क़सम खाई है.

लेकिन अमरीका में रहने के बाद लोगों का इसके प्रति विचार अक्सर बदल जाता है. यह समझना कोई मुश्किल नहीं.

पिछले दिनों मैं न्यूयॉर्क शहर में दक्षिण एशियाई पत्रकारों के एक सम्मलेन में गया जहाँ पूरे देश से एक हज़ार से भी अधिक पत्रकार आये हुए थे.

मुझे बताया गया कि इस समय अमरीका में दक्षिण एशिया से संबंध रखने वाले पत्रकारों की संख्या हज़ार से ऊपर है. और यही नहीं, वाशिंगटन पोस्ट और हफिंग्टन पोस्ट जैसे देश के बड़े अख़बारों के सम्पादक भी ऐसे भारतीय हैं जो भारत से यहाँ काम करने आए हैं.

लोगों का मानना है कि काम में भेद भाव न के बराबर होने के कारण ऐसा संभव हुआ है.

यह किसी और पश्चिमी देश में शायद ही मुमकिन हो. या फिर ग्राउंड ज़ीरो के निकट एक बड़ी मस्जिद और सांस्कृतिक केंद्र की योजना के विवाद को ही ले लीजिए. इस विवाद ने देश को दो ख़ेमों में ज़रूर बाँट दिया है लेकिन बहुमत उन लोगों की है जिन्हें वहां मस्जिद बनाये जाने पर ऐतराज़ नहीं है.

अगर ऐसा ही मामला किसी मुस्लिम देश में होता तो क्या किसी संवेदनशील स्थान के नज़दीक किसी दूसरे मज़हब के प्रार्थना स्थान की योजना को मंज़ूरी मिलती?

व्हाइट हाउस का नज़ारा

Image caption व्हाइट हाउस में विश्व भर से आए पर्यटक दिखाई देते हैं.

अमरीका, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान और यहाँ तक कि पाकिस्तान में चरमपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध में लड़ ज़रूर रहा है लेकिन विश्व की सबसे प्रसिद्ध इमारत, व्हाइट हॉउस को देख कर यह कहना मुश्किल होगा.

और वो इसलिए भी क्योंकि 11 सितम्बर 2001 के चरमपंथी हमलों के असल निशानों में यह इमारत भी थी जो अमरीका के राष्ट्रपति का सरकारी निवास है.

पहले तो यह इमारत दिल्ली के राष्ट्रपति भवन से कहीं छोटी दिखाई देती है और फिर आस-पास सुरक्षा दस्ते भी दिखाई नहीं देते. हाँ निहत्थे पुलिस वाले टहलते ज़रूर मिल जाएंगे.

व्हाइट हॉउस के ठीक बाहर विश्व भर से आए पर्यटक सबसे ज़्यादा दिखाई देते हैं.

अगर ओबामा खिड़की से बाहर झाँक कर देखते होंगे तो उन्हें इमारत के सामने बैठ कर कोई सिगरेट सुलगाता नज़र आएगा तो कोई उनके निवास की तस्वीरें खींचता और कुछ लोग अपनी गर्लफ्रेंड को किस करते दिखाई देंगे.

राजधानी वाशिंगटन की सड़कों पर भी सुरक्षा उतनी नहीं दिखाई देती जितनी दिल्ली और मुंबई की सड़कों पर.

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