परमाणु विधेयक पर और झुकने के संकेत

एक परमाणु संयंत्र
Image caption परमाणु संयंत्र में होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए कंपनी के साथ आपूर्तिकर्ता की जवाबदेही तय करने का दबाव है

परमाणु दायित्व विधेयक को संसद के मानसून सत्र में पारित करवाने में जुटी सरकार ने कहा है कि वह आपूर्तिकर्ताओं को लेकर विवादित हिस्से को विधेयक से हटाने को तैयार है.

मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी दलों ने इस पर आपत्ति की थी.

मंगलवार को वामपंथी नेता सीताराम येचुरी से हुई चर्चा के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री के रुप में कार्य कर रहे पृथ्वीराज चौहान ने कहा है कि विपक्ष ने जिन हिस्सों पर आपत्ति की है उसे सरकार हटाने को तैयार है.

क्या है परमाणु दायित्व विधेयक?

परमाणु दायित्व विधेयक-2010 भारत में असैन्य परमाणु संयंत्र लगाने और चलाने वाली कंपनियों पर किसी दुर्घटना की स्थिति में दायित्व तय करने के लिए लाया जा रहा है.

अमरीका सहित दूसरे परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों से परमाणु संयंत्रों की तकनीक और ईंधन की आपूर्ति इस क़ानून के लागू हो जाने के बाद ही शुरु हो सकेगी.

सरकार चाहती है कि नवंबर में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा से पहले यह क़ानून लागू कर लिया जाए.

संभावना है कि बुधवार को इस विधेयक को संसद में पेश किया जाएगा.

विवाद

इस विधेयक को पहले संसद की स्थाई समिति को भेजा गया था और समिति की अनुशंसा के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पुराने विधेयक में कुल 18 संशोधन किए हैं.

जिसमें किसी दुर्घटना की सूरत में दिए जाने वाले मुआवज़े की अधिकतम राशि 500 करोड़ से बढ़ाकर 1500 करोड़ करना शामिल है.

अब विपक्षी दलों को आपत्ति है कि सरकार विधेयक में परमाणु संयंत्र के लिए आपूर्तिकर्ताओं को बचने का रास्ता दे रही है.

दरअसल विधेयक की धारा 17 में लिखा हुआ है कि किसी दुर्घटना की स्थिति में उपकरण और ईंधन आदि की आपूर्ति करने वाली की ज़िम्मेदारी तभी होगी जब यह साबित हो जाए कि ऐसा 'जानबूझ कर' या 'इरादतन' किया गया है.

विपक्षी दलों का कहना है कि ऐसा लिखने से आपूर्तिकर्ता पर ज़िम्मेदारी साबित करना कठिन हो जाएगा.

उनका आरोप है कि सरकार ऐसा अमरीकी आपूर्तिकर्ताओं को बचाने के लिए कर रही है.

सहमति

लेकिन अब सरकार की ओर से कहा गया है कि यदि विपक्ष को इस शब्द पर आपत्ति है तो वह विधेयक में आवश्यक संशोधन करने के लिए राज़ी है.

सीपीएम के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी से पृथ्वीराज चौहान की मुलाक़ात के बाद येचुरी ने कहा, "मंत्री की बातों से ऐसा लगता है कि सरकार हमारे दृष्टिकोण पर विचार करने के लिए तैयार हैं ख़ासकर आपूर्तिकर्ताओं के दायित्व को लेकर. लेकिन हमें विधेयक को ध्यान से पढ़ना होगा."

उनका कहना है कि पृथ्वीराज चौहान ने आश्वासन दिया है कि वामपंथी इस विधेयक के लिए जो भी संशोधन सुझाएँगे सरकार सभी प्रासंगिक संशोधनों को स्वीकार करने को तैयार है.

इससे पहले चौहान ने भाजपा के नेता अरुण जेटली से मुलाक़ात की थी.

भाजपा के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने कहा है, "भाजपा ने अपनी राय दे दी है और अब हम सरकार की ओर से आने वाले प्रारूप का इंतज़ार करेंगे."

उद्योगों को आपत्ति

लेकिन इस विधेयक पर अब औद्योगिक संगठनों की ओर से आपत्तियाँ सामने आ गई हैं.

उनका कहना है कि विधेयक की धारा 17-बी को हटा ही दिया जाना चाहिए क्योंकि उस पर अमल नहीं किया जा सकता.

भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक परिसंघ (फ़िक्की) के अध्यक्ष राजन भारती मित्तल ने प्रधानमंत्री को लिखे एक पत्र में लिखा है, "भारतीय और विदेशी कंपनियों को देश के परमाणु कार्यक्रम में हिस्सेदार बनाने के लिए विधेयक की धारा 17-बी को पूरी तरह से हटा देना चाहिए."

वहीं सीआईआई के निदेशक ने कहा है कि इस धारा में जो प्रावधान किए गए हैं उससे ऐसा लगता है कि यह प्रावधान आपूर्तिकर्ताओं को अलग-थलग करने के लिए किए गए हैं.

उनका कहना है कि 60 वर्षों की संयंत्र की उम्र तक और किसी दुर्घटना की स्थिति में 20 वर्षों तक मुआवज़ा मांग सकने का प्रावधान आपूर्ति की शर्तों के लिहाज़ से बहुत कठिन है.

एक निजी कंपनी के अधिकारी ने एक टेलीविज़न चैनल पर उदाहरण देते हुए पूछा कि भोपाल की गैस त्रासदी एक वॉल्व के ख़राब होने की वजह से हुई थी, अगर किसी संयंत्र में ऐसा होता है तो दस हज़ार रुपए का वॉल्व सप्लाई करने वाली कंपनी 1500 करोड़ रुपए का मुआवज़ा किस तरह दे सकेगी?

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