परमाणु विधेयक लोकसभा में पारित

तारा परमाणु केंद्र

भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा में परमाणु दायित्व विधेयक कई संशोधनों के बाद पारित हो गया है.

इससे पहले बहस के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि परमाणु दायित्व विधेयक उस सफ़र का अंतिम पड़ाव है जिससे भारत पर थोपी गई परमाणु भेदभाव की नीति का अंत होगा. उन्होंने पूरी लोकसभा से इसे सर्वसम्मति से पारित करने का अनुरोध किया है.

परमाणु दायित्व विधेयक को बुधवार को लोकसभा में पेश किया गया. सरकार ने कहा कि इसमें विपक्षी दलों की माँग के अनुरुप संशोधन किए गए हैं और धारा सात-बी में आपूर्तिकर्ताओं के लिए जो़ड़ा गया है. 'जानबूझ कर' या 'इरादतन' शब्द हटा दिया गया है.

इस विधेयक को लोकसभा में रखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि इसके तहत मुआवज़े की दर 500 करोड़ से बढ़ाकर 1,500 करोड़ कर दी गई है जैसा कि अमरीका में भी है.

क्या है परमाणु दायित्व विधेयक?

'भारत के हितों से समझौता नहीं'

विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के नेता जसवंत सिंह ने परमाणु संयंत्रों की पर्याप्त सुरक्षा पर ज़ोर दिया.

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों द्वारा रखी गए कई संशोधन भी पारित किए गए. लेकिन वाम दलों समेत अन्य विपक्षी दलों के संशोधन पारित नहीं हुए.

उधर राष्ट्रीय दल के नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने विधेयक का विरोध करते हुए एक अख़बार की ख़बर का हवाला दिया और कांग्रेस-भाजपा में इस मुद्दे पर सांठगाठ का आरोप लगाया.

बहस में विपक्षी दलों के सदस्यों के उठाए कुछ मुद्दों का जवाब देते हुए प्रधामंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, "ये कहना कि ये विधेयक भारत के हितों से समझौता करता है, या अमरीकी कंपनियों को मदद करता है, तथ्यों से दूर होगा. ये परमाणु भेदभाव की नीति को ख़त्म करता है."

मनमोहन सिंह का कहना था कि उनके ख़िलाफ़ ये पहली बार नहीं कहा जा रहा कि अमरीका के दबाव में कोई क़दम उठाया जा रहा है.

उनका कहना था कि जब उन्होंने 1992 में वित्त मंत्री के तौर पर बजट पेश किया था तब भी ऐसे ही आरोप लगे थे.

भोपाल का हवाला

बहस को समाप्त करते हुए पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि विधेयक में विपक्षी पार्टी भाजपा की आपत्तियों को सुना गया और सुझाए गए संशोधन को माना भी गया है.

उनका कहना था कि इस विधेयक के बाद भारत के शोध कार्यक्रमों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. उन्होंने कहा कि परमाणु विधेयक के ज़रिए परमाणु ऊर्जा का उत्पादन होगा जो साफ़ ईंधन है.

उनका कहना था कि इस विधेयक में किसी आपदा की स्थिति में मुआवजा़ जल्दी मिलने का भी प्रावधान किया गया है.

इससे पहले चौहान ने कहा था कि इसकी ज़रूरत इसलिए हैं ताकि यदि कोई हादसा होता है तो पीड़ित लोगों को दर-दर भटकना न पड़े और उन्हें मुआवज़ा मिल सके.

भोपाल गैस त्रासदी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के किसी भी क़ानून के न होने के कारण पीड़ितों को अनेक दुख भोगने पड़े हैं.

चौहान का कहना था कि 28 देशों में पहले से ऐसे का़नून हैं लेकिन भारत और पाकिस्तान में ही ऐसा क़ानून नहीं है.

विवाद

इस विधेयक को पहले संसद की स्थाई समिति को भेजा गया था और समिति की अनुशंसा के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पुराने विधेयक में कुल 18 संशोधन किए.

इनमें किसी दुर्घटना की सूरत में दिए जाने वाले मुआवज़े की अधिकतम राशि 500 करोड़ से बढ़ाकर 1500 करोड़ करना शामिल है.

लेकिन विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि सरकार विधेयक में परमाणु संयंत्र के लिए आपूर्तिकर्ताओं को बचने का रास्ता दे रही है.

दरअसल गत शुक्रवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जो विधेयक पास किया था उसकी धारा 17 में लिखा हुआ है कि किसी दुर्घटना की स्थिति में उपकरण और ईंधन आदि की आपूर्ति करने वाले की ज़िम्मेदारी तभी होगी जब यह साबित हो जाए कि ऐसा 'जानबूझ कर' या 'इरादतन' किया गया है.

विपक्षी दलों का कहना था कि ऐसा लिखने से आपूर्तिकर्ता पर ज़िम्मेदारी साबित करना कठिन हो जाएगा.

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