बर्मा में चुनाव लड़ने को वर्दी उतारी

थान श्वे
Image caption आम राय ये है कि संसद में सेना का प्रभुत्व बढ़ाने के लिए अधिकारी वर्दी उतार रहे हैं

बर्मा से मिली रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि आगामी नवंबर में होने वाले आम चुनावों से पहले कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने इस्तीफ़े दे दिए हैं.

शुक्रवार को सैन्य प्रशासन ने एक भारी फेर बदल के तहत दर्जन भर से ज़्यादा सैन्य अधिकारियों को सेवानिवृत्त कर दिया.

अभी ये स्पष्ट नहीं है कि इस्तीफ़ा देने वाले अधिकारियों में सैन्य प्रशासक जनरल थान श्वे और उनके सहयोगी जनरल मौंग आई भी शामिल हैं या नहीं.

विश्लेषकों का मानना है कि बर्मा की संसद में सेना का प्रभुत्व बनाए रखने के लिए सेना ने ये क़दम उठाया है, जिसके बाद नागिरक की हैसियत से चुनाव लड़ कर सेना ही संसद में पहुंचें.

इससे पहले सेना ने अप्रैल में फेर बदल किया था जिसके तहत प्रधानमंत्री थीन शीन समेत लगभग 30 वरिष्ठ सैन्य अधिकारी सेवानिवृत्त कर दिए गए थे.

आम तौर पर यही माना जा रहा है कि सेना ने इसीलिए ये क़दम उठाया है जिससे वह अधिकारी 7 नवंबर को होने वाले आम चुनावों में नागरिक की हैसियत से हिस्सा ले सकें.

बर्मा का सैन्य प्रशासन इन चुनावों को लोकतंत्र की दिशा में उठा एक अहं क़दम मान रही है.

सेना का पाखंड

लगभग 5 दशकों के सैन्य शासन के बाद आगामी नवंबर में लोकतांत्रिक चुनाव करवाए जाएंगे, लेकिन विश्लेशकों के मुताबिक ये चुनाव सेना का एक पाखंड हैं.

बर्मा की संसद में वैसे भी 25 फ़ीसदी सीटें सेना के लिए आरक्षित हैं.

देश के नए संविधान के मुताबिक 440 सीटों वाली संसद में 110 सीटें सेना की होंगी और 330 पर नागरिक चुनाव लड़ सकेंगे.

अगर अवकाश प्राप्त जनरल चुनाव लड़ेंगे तो उन्हें सेना के लिए आरक्षित कोटा में से नहीं, बल्कि आम नागरिक की सीटों पर टिकट दिए जाएंगे.

इन चुनावों में न तो देश की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सां सू ची हिस्सा लेंगी और न ही उनकी पार्टी नेशलन लीग फॉर डेमौक्रेसी ही चुनाव मैदान में होगी.

सन 1990 में हुए पिछले चुनावों में आंग सां सू ची की को भारी बहुमत से जीत मिली थी लेकिन बर्मा के सैन्य प्रशासकों ने चुनाव नतीजे मानने से इंकार कर दिया.

नैशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी का कहना है कि चुनावी क़ानून अनुचित और ग़ैर लोकतांत्रिक हैं.

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