सुइयों ने बनाया चैंपियन

अर्जुन अटवाल
Image caption पीड़ा से टूटे गोल्फ़ खिलाड़ी अर्जुन अटवाल को एक्यूपंक्चर ने फिर बनाया चैंपियन

अर्जुन अटवाल को इस बार जब टेलिविज़न स्क्रीन पर एक ऐसे विजेता की मुद्रा में देखा, जो दुनिया फ़तह कर आया हो, तो मेरे मन में उनका वह आशंकित चेहरा कौंध गया, जो कुछ समय पहले एक डॉक्टर के क्लिनिक पर देखा था.

वह चेहरा एक विजेता का नहीं बल्कि आशंकाओं में घिरे एक टूटे हुए खिलाड़ी का था, जिसे ये डर था कि उसकी पीड़ा उसके भावी सपनों को चकनाचूर कर देगी.

चिंता और अनिश्चय से भरपूर उस चेहरे पर साफ़ लिखा था कि उसकी दुनिया लुटती जा रही है.

अर्जुन अटवाल से वह पहली मुलाक़ात उस डॉक्टर के क्लिनिक पर हुई थी, जिसे भारतीय खिलाड़ी एक चमत्कारी शख़्सियत के रूप में देखते हैं.

डॉ जतिन चौधरी, जिनके क्लिनिक में एक बार मेरी मुलाक़ात युवराज सिंह से भी हुई थी, तब युवराज सिंह ने बताया था कि किस तरह चमत्कारी ढंग से डॉक्टर जतिन चौधरी ने एक्यूपंक्चर यानि सुई सर्जरी से उनके घुटनों को दुरु्स्त कर दिया था.

ये वही डॉक्टर जतिन चौधरी हैं, जिन्होंने सानिया मिर्ज़ा की कलाई के दर्द का भी एक्यूपंक्चर से इलाज किया था.

इस डॉक्टर का इतना गुणगान सुनने के बाद मुझ पर कुछ ऐसा असर हुआ कि मैं भी उनका मरीज़ बन बैठा.

अपने इलाज के सिलसिले में एक बार जब क्लिनिक पहुंचा, तो मरीज़ों की उस भीड़ में एक जाना पहचाना चेहरा दिखा.

डॉ जतिन चौधरी ने बताया कि वह अमरीका से आए कोई गोल्फ़ खिलाड़ी अर्जुन अटवाल हैं.

लेकिन जब डॉ चौधरी को बताया गया कि यह गोल्फ़ खिलाड़ी भारत का ही नहीं बल्कि दुनिया का एक बेहतरीन गोल्फ़ खिलाड़ी है, तो अर्जुन अटवाल को तुरंत अंदर बुलाया गया.

अटवाल एक बुज़ुर्ग व्यक्ति के साथ आए थे.

जब तक अटवाल ने अपनी समस्या डॉक्टर को बताई तब तक मैंने उनके साथ आए बुज़ुर्ग को बातों में लगाया.

पता चला कि चाँद भल्ला नाम के वह बुज़ुर्ग अटवाल के ससुर हैं, और अपने दामाद की पीड़ा को लेकर काफ़ी चिंतित हैं.

Image caption मैदान पर स्टिक घुमा कर शॉट लगाने का चस्का अक्सर कंधे और घुटनों का दर्द दे जाता है

बातों बातों में वे मुझ से ये जानने की कोशिश करते रहे कि डॉक्टर जतिन चौधरी का इलाज कितना असरदार है, वग़ैरह वग़ैरह.

उधर सानिया की सिफ़ारिश पर, अनिश्चय के भंवर में डूबते उतराते, अर्जुन अटवाल यहां तक तो पहुंच गए थे, लेकिन आगे क्या होगा इसके बारे में उन्हें कुछ पता नहीं था.

अटवाल से मिलने से पहले मुझे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि गोल्फ़ से खिलाड़ियों के घुटनों और कंधों को कितना ख़तरा हो सकता है.

अर्जुन अटवाल ने इस बारे में मुझे बताया, “जब तेज़ गति से स्टिक घुमाई जाती है, तो असाधारण कोणों पर मुड़े हुए घुटनों में ऐसा खिंचाव आता है कि ज़्यादातर गोल्फ़ खिलाड़ी अपने घुटनों और कंधों को चोटिल बना लेते हैं.”

सुई चिकित्सा का चमत्कार

अर्जुन अटवाल ने बताया कि वह भी इसी तरह कंधों और घुटनों का दर्द मोल ले चुके हैं और अब सर्जरी ही एक विकल्प बचा है.

लेकिन अटवाल युवराज सिंह की तरह ऐसी लंबी और जटिल शल्य चिकत्सा में नहीं उलझना चाहते थे, जिसकी वजह से कम से कम साल भर की छुट्टी पर जाना पड़े.

इसके अलावा उन्हें ये डर भी था कि कहीं उनका ‘प्रोफैशनल गोल्फ़ एसोसिएशन’ यानि पीजीए कार्ड ही न छिन जाए और फिर सर्जरी के बाद की समस्याओं से न जूझना पड़ जाए.

लेकिन सानिया ने जब उन्हें बताया कि सुई चिकित्सा से उन्हें कितना फ़ायदा हुआ तो अटवाल ने भी इसी चिकत्सा को आज़माने का फ़ैसला किया.

उसके बाद अटवाल कई दिनों तक अपनी पत्नी के साथ क्लिनिक आते रहे और चीन निर्मित लगभग 50 सुइयों से अपनी पसंद की उँगली बिंधवाते रहे और साथ साथ फ़िज़ियोथेरेपी का भी सहारा लेते रहे, इस उम्मीद के साथ, कि हफ़्ते दस दिन में उनकी पीड़ा ग़ायब हो जाएगी.

और इस हफ़्ते पीजीए ख़िताब जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बनने के बाद जो मुस्कान अर्जुन अटवाल के चेहरे पर दिखी, उसने वह दिन याद दिला दिया जब उन्होंने डॉक्टर चौधरी के क्लिनिक पर ही ये कहा था कि सुई चिकित्सा से उनका इलाज हो गया है, और अब उन्हें सर्जरी की कोई ज़रूरत नहीं है.

ये एक चमत्कार ही था, जिसने एक दर्द से टूटे हुए एक चैंपियन को इतना भला चंगा कर दिया कि वे जब चाहें अपने सपनों को साकार कर लें.

(लेखक हिन्दुस्तान टाइम्स अख़बार के खेल सलाहकार हैं)

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