महँगे अनाज पर संयुक्त राष्ट्र चिंतित

रुस में गेहूं की फ़सल तबाह
Image caption भीषण गर्मी और सूखे के कारण रूस के कई हिस्सों में गेहूं की फ़सलें तबाह हो गईं.

संयुक्त राष्ट्र ने पिछले कुछ समय से तेज़ी से बढ़ रही अनाज की कीमतों के बारे में विचार विमर्श करने के लिए दुनिया भर के नीति निर्माताओं की एक अहम बैठक बुलाई है.

गुरुवार को रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमिर पुतिन ने गेहूँ के निर्यात पर प्रतिबंध बढ़ा दिया था. रूस के इस क़दम के बाद ये बैठक बुलाने का ऐलान किया गया है.

संयुक्त राष्ट्र को इस बात की चिंता सताने लगी है कि अनाज की क़ीमतें बहुत बढ़ सकती हैं जिसकी मार दुनिया भर के ग़रीब लोगों पर पड़ेगी.

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संस्था (एफ़एओ) ने बताया है कि ये बैठक रोम में 24 सितंबर को होगी.

एफ़एओ ने कहा, "पिछले कुछ हफ़्तों में दुनिया भर में अनाज के अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में गेहूँ की क़ीमतों में उछाल देखा गया है. इससे गेहूँ की कमी होने की चिंता गहराने लगी है."

"ये बैठक इसलिए बुलाई गई है ताकि अनाज का आयात-निर्यात करने वाले देश इस बात पर चर्चा कर सकें कि मौजूदा स्थिति पर सही प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए."

सूखा और गर्मी

रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमिर पुतिन ने ये स्पष्ट नहीं किया है कि 15 अगस्त से लेकर 31 दिसंबर तक अनाज के निर्यात पर लगा प्रतिबंध कब तक हटेगा लेकिन इतना ज़रूर कहा है कि अगले साल की फ़सल आने से पहले प्रतिबंध नहीं होगा.

रूस दुनिया में गेहूँ, जौ और राई के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है. इस साल रूस सारी गर्मी सूखाग्रस्त रहा है.

Image caption रूस दुनिया में गेहूं, जौ और राइ के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है.

भीषण गर्मी के कारण पूरे देश में फ़सलें बर्बाद हो गई हैं. इससे खाने की क़ीमतों भी बढ़ गई हैं.

रूस में इस साल अनाज की पैदावार छह करोड़ टन तक ही हो सकती है जो बेहद कम है. रूस को अपने देश में खाने की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ही आठ करोड़ टन की ज़रूरत है. यानी सोची गई पैदावार से दो करोड़ टन ज़्यादा.

इसके अलावा दूसरे मुख्य अनाज के उत्पादक देशों में भी अनाज की कमी हुई है. इससे स्थिति और भी ज़्यादा ख़राब हो गई है क्योंकि जुलाई के बाद से गेहूं की क़ीमतें 50 प्रतिशत ज़्यादा बढ़ गई हैं.

इस सप्ताह खाने की सामग्रियों की बढ़ती क़ीमतों को लेकर मोज़ांबीक में दंगे हुए जिसमें सात लोग मारे गए.

बढ़ रही क़ीमतों पर को लेकर चिंता होने के बावजूद जानकार कहते हैं कि दुनियाभर में दो साल पहले के मुक़ाबले अनाज की मात्रा काफ़ी ज़्यादा है.

साल 2007-08 में, खाने की भारी कमी और क़ीमतों में बढ़ोतरी की वजह से कई देशों में दंगे शुरु हो गए थे.

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