संविधान संशोधनों पर जनमत संग्रह

तुर्की में संविधान में व्यापक परिवर्तन पर जनमत संग्रह हो रहा है.

जनता के सामने एकमुश्त 26 संविधान संशोधनों का प्रस्ताव रखा गया है.

इन संशोधनों के ज़रिए तुर्की की सेना को असैनिक अदालतों के प्रति ज़्यादा ज़िम्मेवार बनाया जाएगा. इसमें जजों की नियुक्तियों में संसद को पहले से ज़्यादा अधिकार देने की बात है.

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रस्ताव है- सरकारी कर्मचारियों को समझौते और हड़ताल करने का अधिकार देना.

ज़्यादातर संविधान संशोधनों पर किसी तरह का विवाद नहीं है. इसी तरह ज़्यादातर संशोधन प्रस्तावों पर यूरोपीय संघ की भी सहमति है.

उल्लेखनीय है कि तुर्की यूरोपीय संघ में शामिल होने के लिए वर्षों से प्रयासरत है.

लेकिन 26 में से दो संविधान संशोधन प्रस्तावों पर प्रधानमंत्री रजप तैयप अर्दोगान के समर्थकों और उनके विरोधियों में व्यापक मतभेद हैं. इन दो संशोधनों का घोषति लक्ष्य तो है तुर्की की न्यायिक व्यवस्था में सुधार करना, लेकिन विपक्षी दलों का कहना है कि इनके ज़रिए सरकार न्यायपालिका को अपने प्रभाव क्षेत्र में लेना चाहती है.

न्यायपालिका से टकराव

उल्लेखनीय है कि तुर्की की न्यायपालिका और सरकार में अक्सर टकराव होते रहे हैं. धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर तुर्कों की नज़र में ये न्यायपालिका ही है जो प्रधानमंत्री अर्दोगान की इस्लामी बुनियाद वाली जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी(एकेपी) को नियंत्रित रख पाती है.

दूसरी ओर अर्दोगान अदालतों पर राजनीति से प्रेरित फ़ैसले सुनाने का आरोप लगाते रहे हैं.

अधिकांश संविधान संशोधन प्रस्ताव भले ही विवाद रहित हों, लेकिन जनमत संग्रह से पहले की रायशुमारियों से यही संकेत मिलते हैं कि संविधान संशोधनों के पैकेज पर जनता दो हिस्सों में बंटी हुई है.

और जो लोग इस पैकेज के पक्षधर हैं उनमें से भी बहुतों को ये शिकायत है कि संविधान संशोधनों के प्रस्ताव पर पर्याप्त बहस नहीं कराई गई है.

तुर्की का मौजूदा संविधान 1980 के दशक में सैनिक शासन के तहत तैयार किया गया था.

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