क़ुरान जलाने का ऐलान 'ख़तरनाक'

टेरी जॉस

एक ईसाई संगठन की 11 सितंबर को अमरीका पर अल क़ायदा के हमले की बरसी पर क़ुरान की प्रतियाँ जलाने की योजना की व्यापक निंदा हुई है.

अमरीकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने इस फ़ैसले को 'अनादर करने वाला और अपमानजनक' ठहराया है जबकि अमरीकी एटोर्नी जनरल एरिक होल्डर ने इसे 'मूर्खतापूर्ण और ख़तरनाक' बताया है.

इस फ़ैसले पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई है. अफ़ग़ानिस्तान और इंडोनेशिया और ईरान में इसके विरोध में प्रदर्शन हुए हैं और विरोध करने वालों ने कहा है कि क़ुरान की प्रतियाँ जलाने पर भारी प्रतिक्रिया होगी.

'क़ुरान जलाना सैनिकों पर भारी पड़ेगा'

लेकिन मात्र 50 सदस्यों वाला ईसाई संगठन 'डव वर्ल्ड आउटरीच सेंटर' अपने फ़ैसले पर अड़ा हुआ है.

इसके पैस्टर टेरी जॉंस ने कहा है, "हमारे लिए इस्लाम धर्म के कट्टरपंथी तत्वों को स्पष्ट संदेश देना ज़रूरी है."

अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सेना के शीर्ष कमांडर जनरल डेविड पेट्रियस पहले ही आगाह कर चुके हैं कि ऐसा करने से अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की जान को ख़तरा बढ़ सकता है और इससे पूरे विश्व में समस्याएँ खड़ी हो सकती हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय के प्रवक्ता रॉबर्ट गिब्स ने कहा कि यदि कोई भी कार्रवाई अमरीकी सैनिकों के लिए ख़तरा बढ़ाती है तो वह चिंता का विषय है.

तीखी प्रतिक्रिया

अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता पीजे क्रॉली ने कहा, "ऐसी योजना भड़काऊ, अपमानजनक, असंवेदनशील और विभाजित करने वाली है. हमें इस बात का एहसास है कि अनेक लोगों ने इसको ख़ारिज किया है. और अधिक संख्या में अमरीकियों को इसका विरोध करना चाहिए और कहना चाहिए कि ऐसा काम अमरीकी मूल्यों के अनुरूप नहीं है."

Image caption अफ़ग़ानिस्तान में इसके विरोध में प्रदर्शन हुए हैं

उनका कहना था, "इस कार्यक्रम का आयोजन करने वाले पैस्टर का कहना है कि वे कट्टरपंथ का मुक़ाबला करना चाहते हैं. दरअसल, यदि ऐसा होता है (हम आशा करते हैं ऐसा नहीं होगा) तो इससे कट्टरपंथ बढ़ेगा.''

अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का कहना था कि दुनिया भर में लोगों को भी ये समझना चाहिए कि एक पैस्टर या उनके 50 समर्थक अमरीका का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.

उनके अनुसार अमरीका 30 करोड़ लोगों का देश है और अमरीकियों के बहुमत की राय स्पष्ट है कि ये योजना अनुचित है और ऐसा नहीं होना चाहिए.

मंगलवार को वॉशिंगटन में विभिन्न धर्मों के नेताओं की बैठक में इस फ़ैसले की निंदा हुई और इसे बाइबल और अमरीकी मूल्यों का उल्लंघन बताया गया.

इस बैठक में रोमन कैथोलिक, यहूदी और मुसलमान नेता शामिल हुए.

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