'ख़तरे में है खेती लायक ज़मीन'

धान
Image caption बैंक ने इस तरह की ख़रीद के फ़ायदे और नुक़सान भी गिनाए हैं

विश्व बैंक का कहना है कि खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में अस्थिरता ने धनी देशों के निवेशकों को विकासशील देशों में खेती करने लायक ज़मीन खरीदने के लिए प्रेरित किया है.

बैंक की ओर से 'राइजिंग ग्लोबल इंटरेस्ट इन फार्मलैंड' यानी 'कृषियोग्य भूमि में दुनिया की बढ़ती दिलचस्पी' के नाम से जारी रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र किया गया है.

बैंक का कहना है कि धनी देश अनिश्चितता और क़ीमतों में संभावित मूल्यवृद्धि को देखते हुए यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सामान्य रूप से होती रहे.

फ़ायदे और नुक़सान

हाल के दिनों में रूस में लगी आग के कारण गेहूं की क़ीमतों अचानक उछाल आ गया था.

विश्वबैंक ने इस तरह के सौदों से होने वाले नुक़सान और फ़ायदे की ओर भी इशारा किया है.

बैंक ने कहा है कि इस तरह की कृषि योग्य ज़मीन ख़रीदने के बाद इसके नए मालिक कृषि की नई तकनीकी लाएंगे और उन्नत खेती पर भारी निवेश करेंगे, इससे पैदावार बहुत अधिक बढ़ जाएगा.

रिपोर्ट की एक ख़ास बात यह है कि इसमें यह बताया गया है कि दुनिया में क़रीब एक अरब लोग भूखे हैं.

इसकी कमियों की ओर ध्यान दिलाते हुए बैंक ने कहा है कि ज़मीन के इस ख़रीद-फ़रोख़्त के पर्यावरणीय और सामाजिक ख़तरे भी हैं.

उसका कहना है कि ये निवेशक ऐसी जगह ज़मीन ख़रीदना ज्यादा पसंद करते हैं जहाँ जमीन के मालिक को आसानी बेदखल कर ज़मीन पर कब्ज़ा किया जा सके.

बैंक ने इस तरह के सौदों पर मज़बूत पकड़ और पैनी निग़ाह रखने पर ज़ोर दिया है.

विश्व बैंक ने इसका सारा दोष केवल विदेशी निवेशकों पर ही नहीं मढ़ा है, उसने विकासशील देशों की सरकारों को ग़रीब और पिछड़े समुदायों के प्रति और अधिक ज़िम्मेदारी निभाने को कहा है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के निवेश से पिछले साल हुए सौदौं के तहत साढ़े चार लाख हेक्टेयर जमीन का मालिकाना हक़ बदल गया है.

यह पिछले दशक में हुए इस तरह के सौदों से 10 गुना अधिक है.