मुंबई के डब्बेवाले हुए हाईटेक

 डब्बेवाले
Image caption मुंबई में फिलहाल 5000 डब्बेवाले काम कर रहे हैं

घर के गर्मागरम खाने को हर दिन सही समय, सही पते पर दफ्तरों में पहुंचाने का काम करते हैं मुंबई के डिब्बेवाले.

दुनियार में अपने काम के लिए मशहूर ये हज़ारों डिब्बेवाले अब अपना काम आसान करने के लिए अंग्रेज़ी और कंप्यूटर का पाठ पढ़ रहे हैं.

मुंबई के डिब्बेवाले हर दिन लगभग दो लाख घरों से खाने के डिब्बे (टिफिन) इक्कठा करते हैं और उन्हें शहर के अलग-अलग कोनों में मौजूद दफ़्तरों और फैक्टरियों तक पहुंचाते हैं.

मुंबई में फिलहाल 5000 डिब्बेवाले काम कर रहे हैं जिन्हें दुनियाभर काम करने के सटीक तरीके के लिए जाना जाता है.

इन लोगों के इस काम को आसान और बेहतर बनाने के लिए महाराष्ट्र के यशवंत राव छवन मुक्त विश्वविद्दालय ने अंग्रेज़ी और कंप्यूटर का एक पाठ्यक्रम शुरु किया है.

सरल और उपयोगी

डिब्बेवालों के लिए शुरु की गई ये खास कक्षाएं रविवार को होंगी. इस पाठ्यक्रम के लिए खासतौर पर सरल और उपयोगी किताबें तैयार की गई हैं.

डिब्बेवालों के संगठन के अध्यक्ष रघुनाथ मेड़गे ने खुद इस कोर्स के तहत प्रशिक्षण प्राप्त किया है. उन्होंने कहा कि ज़्यादातर डिब्बेवाले कुछ साल की पढ़ाई के बाद इस व्यवसाय से जुड़ जाते हैं.

जो लोग आगे पढ़ते हैं उनकी शिक्षा भी मराठी माध्यम से होती है. इस कोर्स के ज़रिए हमें न सिर्फ अपने काम में मदद मिलेगी बल्कि हमारे बच्चे भी बेहतर शिक्षा पाने के लिए प्रोत्साहित होंगे.

डिब्बों के इस व्यवसाय से दशकों से जुड़े गंगाराम तालेकर का कहना है कि ये कोर्स एक अच्छी शुरुआत है क्योंकि आजकल तकनीक और जानकारियों के बिना कोई भी काम करना मुश्किल है.

उन्होंने कहा,''कई ग्राहक एसएमएस और ईमेल के ज़रिए हमने संपर्क करना चाहते हैं अगर हम अंग्रेज़ी या कंप्यूटर नहीं जानेंगे तो हमें दूसरों के भरोसे रहना होगा.''

एक कदम आगे

मुंबई के उत्तरी इलाके में बनी एक छोटी क्लास में 20 डिब्बेवाले अपनी पहली क्लास के लिए जमा हुए.

कमरे में चारों तरफ अंग्रेज़ी में लिखे कुछ पोस्टर हैं. अंग्रेज़ी में जो लिखा है उसका मराठी में भी अनुवाद किया गया है.

डिब्बेवालों पर अध्ययन कर रहे पवन अग्रवाल उन्हें पढ़ाने आए हैं.

पवन का कहते हैं, ''हफ्ताभर ये लोग अपने काम में व्यस्त रहते हैं, इसलिए ये ज़रूरी है कि हफ़्ते में एक दिन लगने वाली इस क्लास में उनकी रुचि हो. हम दूसरी जगहों पर भी इस तरह की कक्षाएं शुरु करेंगे ताकि उन्हें आने-जाने में दिक्कत न हो. ''

डिब्बेवालों को लगन से पढ़ाई में व्यस्त देखकर एहसास होता है कि जो समाज हमेशा अपने हुनर, अपनी सूझबूझ के ज़रिए समय से एक कदम आगे रहा, वो तकनीक और अंग्रेज़ी शिक्षा के इस दौर में भी पीछे छूटने को तैयार नहीं.

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