शिविरों में बच्चे सबसे असुरक्षित

दारफ़ुर के एक कैंप में बच्चे

संय़ुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि विस्थापितों के लिए बने शिविरों में बच्चों के युद्ध की चपेट में आ जाने का ख़तरा सबसे अधिक होता है.

इन शिविरों पर मानवाधिकार परिषद के लिए तैयार एक रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र की अधिकारी राधिका कुमारस्वामी ने कहा है कि इन शिविरों में बच्चों की सुरक्षा बहुत कम है.

उनके अनुसार सुरक्षा इतनी कम होती है कि उनके यौन शोषण और संघर्षरत गुटों के ज़बरदस्ती भर्ती किए जाने का ख़तरा बहुत अधिक रहता है.

ऐसे लाखों लोग सूडान, चाड और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो सहित कई जगह शिविरों में रह रहे हैं.

ये वो लोग हैं जो सशस्त्र संघर्ष से बचना चाहते हैं और भागकर इन शिविरों में पहुँचते हैं और सोचते हैं कि वे सुरक्षित हैं. लेकिन वे दरअसल सुरक्षित होते नहीं.

राधिका कुमारस्वामी ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए बहुत से शिविरों का दौरा किया. इनमें से बहुत से कैंप सूडान के दारफ़ुर इलाक़े में थे. उनका कहना है कि ये कैंप ख़तरनाक जगहें हैं.

उनका कहना है कि ज़्यादातर बच्चे लकड़ियाँ बीनने या फिर शौच आदि के लिए जाते हैं और यौन शोषण का शिकार हो जाते हैं.

राधिका का कहना है कि संघर्ष में लगे गुटों के लिए कैंप वह जगह होती हैं जहाँ वे नई भर्तियों के बाल-सैनिक की तलाश करते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षा की कमी इसकी एक वजह है लेकिन मुख्य वजह इन शिविरों में एक समान नियम-क़ायदे का ना होना है.

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुछ शिविरों का संचालन तो संयुक्त राष्ट्र करता है, कुछ का सहायता एजेंसियाँ और कुछ उन देशों की सरकारें संचालित करती हैं.

इनमें से कुछ में स्कूल हैं तो कुछ में नहीं.

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इन सबसे बचने का तरीक़ा यह है कि एक तो बच्चों को शिक्षा की व्यवस्था की जाए, उन्हें संघर्षरत गुटों की पुहँच से दूर रखा जाए और उन्हें कुछ ऐसी चीज़ें सिखाईं जाएँ जिससे कि वे फिर से जीवन जी सकें.

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