उनके किशन जी, मेरे किशन जी, और आपके?

माओवादी नेता
Image caption मीडिया अपने 'किशनजी' की छवि को बारीकी से नहीं आंकता

इधर जब भी अख़बार या टीवी में ‘किशन जी’ का ज़िक्र आता है, मेरे भीतर कुछ होता है.

ढांपने की कोशिश करता हूं, लेकिन चेहरे पर शिकन आने से रोक नहीं पाता. ग़ुस्सा नहीं आता, शायद कुछ उदास ज़रूर हो जाता हूं. दिलो दिमाग़ में कई सवाल अनायास उतरने लगते हैं.

बंद आंखों के पर्दे पर कई चेहरे चुपचाप आ जाते हैं, बाणी जी, अशोक जी, लिंगराज भाई, नवीन भाई.....!

सोचता हूं उनके मन में क्या हो रहा होगा.

मीडिया के किशन जी

मीडिया की दुनिया के लिए ‘किशन जी’ का मतलब है माओवादियों के भूमिगत नेता मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ़ किशन जी.

भारत सरकार के ‘मोस्ट वांटेड’ (ख़तरनाक अपराधियों की सूची में) नंबर दो.

शीर्ष नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो के सदस्य, जन्म करीमनगर, आंध्र प्रदेश का, लेकिन उड़ीसा और झारखंड होते हुए अब बंगाल के लालगढ़ इलाके में सक्रिय.

इमरजेंसी के वक़्त से ही भूमिगत, सशस्त्र संघर्ष के अगुआ और रणनीतिकार, गमछे से ढंका चेहरा और कंधे पर लटकी बंदूक ( रपट के मुताबिक एके-46) याद दिलाते हैं कि बंदूक की नली से सत्ता प्राप्त करना उनके लिए मुहावरा नहीं है.

फिर भी आपके मन में संदेह हो तो वे स्वयं अपने इंटरव्यू में स्पष्ट कर देते हैं.

बुद्धदेव भट्टाचार्य को बारूदी सुरंग से उड़ाने की योजना उनकी थी.

उनके लोगों ने सत्तारूढ़ माकपा के 52 कार्यकर्ताओं का सफ़ाया किया है.

नक्सली संगठनों की जानकारी रखने वाले लोग बताते हैं कि सख़्त लाइन के हिमायती हैं.

पार्टी के भीतर और बाहर विरोधियों से कड़ाई से पेश आते हैं.

मीडिया अपने ‘किशन जी’ की छवि बारीक़ी से नहीं आंकता, लेकिन कभी कभार आक्रोश से सुलगती आंखों, विद्रूपता भरी मुस्कुराहट या फिर अदम्य संकल्प शक्ति की झलक दिख जाती है.

दूसरे किशन जी

कुछ साल पहले तक ‘किशन जी’का नाम एक दूसरी और बहुत भिन्न छवि से जुड़ा था.

देशभर के जन आंदोलनों में, रचनात्मक कार्यकर्ताओं में, भाषाई बुद्धिजीवियों में या फिर समाजावादी विचार और राजनीति से जुड़े हर कार्यकर्ता के लिए किशन जी का मतलब था किशन पटनायक.

जब भी किसी बैठक में एक पेचीदा लेकिन बुनियादी सवाल खड़ा होता, या फिर बिखरे हुए सूत्रों को समेटने की बारी आती तो सबकी निगाहें एक कोने में सिमट कर बैठे किशन जी की ओर मुड़ जातीं.

जन्म उड़ीसा के कालाहांडी ज़िले में, लेकिन कर्मक्षेत्र उडी़सा से बिहार होते हुए पूरा देश.

युवावस्था से ही लोहिया के सानिध्य में समाजवादी आंदोलन से जुड़ाव.

मात्र 32 साल की आयु में संबलपुर से लोकसभा के सदस्य, लेकिन 1967 में लोहिया के देहांत के बाद लोहिया के अनुयायियों और समाजवादी आंदोलन के भग्नावशेषों से मोहभंग.

इमरजेंसी के पहले से ही किशन जी भी ‘भूमिगत’ हो गए.

संसद और संसदीय लोकतंत्र की शिखर राजनीति से ओझल हो गए.

सन 2004 में अंतिम विदाई से पहले जीवन के अंतिम तीन दशक समाजवादी विचार धारा को नए सिरे से, एक देशज विचार के रूप में गढ़ा.

इस नए विचार के नए राजनैतिक संगठन बनाए.

देश भर में घूम घूम कर नई पीढ़ी के कार्यकर्ता बनाए और सहमना जन आंदोलनों को वैकल्पिक राजनीति की दिशा दिखाई.

दमदार शख़्सियत

किशन जी का व्यक्तित्व राजनीति और राजनेता की प्रचलित छवि को पुन: परिभाषित करने की मांग करता था.

समाज परिवर्तन के लिए राजनीतिक शक्ति की आकांक्षा, लेकिन सत्ता की राजनीति का परित्याग.

वैचारिक आग्रहों पर टिके रहते हुए भी कठिन से कठिन हालात में सच बोलने की ज़िद.

सार्वजनिक जीवन में रहते हुए भी अनूठा संकोच.

चिकनी चुपड़ी बातों से परहेज़, लेकिन अद्भुत सौम्यता और संवेदनशीलता.

अगर कड़ाई थी तो केवल आचार, वाणी और राजनीति में मर्यादा पालन की.

कोशिश करें तो बंगाल की खा़ड़ी की गोद में पले इन दोनों क्रांतिकारियों में कुछ साम्य ढूंढ़ा जा सकता है.

किशन जी के यह दोनों रूप अंतिम व्यक्ति की वेदना का राजनीति के औज़ार से उपचार करने के प्रयास हैं. दोनों चेहरे लोकतंत्र के स्थापित स्वरूप को ख़ारिज करते हैं.

नव साम्राज्यवाद के प्रति सजग हैं. दोनों की राजनीति में आमूल-चूल बदलाव का संकल्प है. दोनों के जीवन में अपिरग्रह है.

संघर्ष के रूप

लेकिन गहराई में देखें, तो किशनजी के यह दो रूप 21वीं सदी के क्रांतिकारियों के लिए दो अलग अलग दिशाएं दिखाते हैं.

एक रास्ता बंदूक की नली से सत्ता हासिल कर राज्य सत्ता के ज़रिए समाज को बदलने के विचार से प्रेरित है.

20वीं सदी में इस विचार ने दुनिया के हर कोने में क्रांतिकारियों को आकर्षित किया.

लेकिन 21वीं सदी की शुरुआत होते होते इस विचार की सीमाएं जग ज़ाहिर होने लगीं.

दिक़्क़त सिर्फ इतनी नहीं है कि समकालीन राज्य सत्ता की सैन्य शक्ति के सामने किसी गुरिल्ला क्रांतिकारी दस्ते की सफलता की संभावना नगण्यप्राय है.

राज्य व्यवस्था के दमन के शिकार समुदायों को न्याय दिलाने के बजाए सशस्त्र क्रांति की राजनीति लोकतांत्रिक राजनीति की बची खुची ज़मीन को भी सिकोड़ देती है.

दिक़्क़त यह भी है कि सशस्त्र क्रांति सत्ता उन्हें नहीं सौंपती, जिनके नाम पर संघर्ष होता है, बल्कि उन्हें सौंपती है, जिनके हाथ में शस्त्र होते हैं.

दूसरा रास्ता लोकतंत्र परिवर्तन की लंबी और कठिन यात्रा के लिए आमंत्रित करता है.

यहां लोकतांत्रिक का मतलब सिर्फ़ चुनाव और वोट नहीं है.

क्रांति के लिए रचना और लोकतांत्रिक संघर्ष इस यात्रा के अभिन्न अंग हैं.

पहली नज़र में यह रास्ता रोमांस और रोमांच विहीन लग सकता है.

लेकन अंतिम व्यक्ति को राजनीति का मोहरा नहीं बल्कि उसकी कसौटी मानने वाला हर क्रांतिकारी जानता है कि टिकाऊ बदलाव इसी रास्ते से आ सकता है.

सशस्त्र संघर्ष की ‘सफलता’ समाज की उर्वर ज़मीन को कई पीढ़ियों तक बंजर बना देती है.

लोकतांत्रिक संघर्ष की ‘असफलता’ भी समाज में परिवर्तन के असंख्य बीज और विचार की नमी छोड़ कर जाती है.

यह दूसरा रास्ता इस देश की मिट्टी से बना है.

रूस, चीन या किसी और देश के मॉडल का दोहराव करने के बजाए यह रास्ता क्रांति की अवधारणा में क्रांति करने का दुस्साहस रखता है.

यूरोप और अमरीका के विकास के मॉडल का अनुसरण करने के बजाए यह रास्ता हमें भारतीय संदर्भ में एक नए मॉडल को गढ़ने का आमंत्रण देता है.

सवाल

राज्य व्यवस्था ने तय कर लिया है कि वह किशन जी की कौन सी आवाज़ सुनेगी.

कालाहांडी की भूख का सवाल लोकसभा में उठाने वाले, देश भर में अलख जगाने वाले और सुप्रीम कोर्ट में भूख का सवाल उठाने वाले किशनजी की आवाज़ को अनसुना कर सरकार ने इशारा कर दिया कि वह बंदूक की आवाज़ सुनेगी.

मीडिया ने भी तय कर लिया कि सरकार का ‘मोस्ट वांटेड’ ही उसका भी सर्वप्रिय है.

अब आपको और हमें तय करना है.

21वीं सदी में एक सुंदर भारत का सपना देखने वालों को तय करना है.

हम ‘किशनजी’ की आवाज़ सुनेंगे या किशन जी की.

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