एड्स कार्यक्रमों पर मंदी की मार

एड्स कार्यक्रमों से जुड़ी संस्थाएं
Image caption एक करोड़ 46 लाख से ज़्यादा लोगों को एड्स की दवाओं की ज़रूरत है.

अंतरराष्ट्रीय स्वास्थय संगठन डब्लूएचओ और संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में जिन लोगों को एचआईवी से बचने के लिए जीवन रक्षक दवाओं की ज़रूरत है उनमें से केवल एक तिहाई लोगों को ही दवाएं मिल रहा है.

सभी देशों में नेताओं ने ये संकल्प किया था कि वो इस साल के अंत तक एचआईवी की दवाओं को सभी के लिए उपलब्ध कराएंगे. लेकिन खर्च में कटौती के चलते ये लक्ष्य पूरा नहीं हो सका है.

रिपोर्ट में ग़रीब देशों को आगाह किया गया है कि वो एचआईवी/एड्स पर किए जाने वाले अपने खर्चों में बढ़ोत्तरी करें.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और कई देशों की कड़े प्रयासों की वजह से एड्स की रोकथाम में सफलता मिली है, लेकिन अब भी बहुत कुछ करना बाकी है.

अनुमान है कि विकासशील देशों में रहने वाले 52 लाख से ज़्यादा लोग एड्स वायरस के ख़तरनाक प्रभाव को खत्म करने वाली ज़रूरी दवाओं का सेवन करते हैं.

हालांकि जानकारों का मानना है कि एक करोड़ 46 लाख से ज़्यादा लोगों को इन दवाओं की ज़रूरत है.

एड्स की रोकथाम के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था कहती है कि बड़ी संख्या में इस बीमारी से जूझ रहे देशों को सरकारी खर्च का लगभग तीन फ़ीसदी हिस्सा इसकी रोकथाम के लिए खर्च करना चाहिए.

Image caption विकासशील देशों में 52 लाख से ज़्यादा लोग एड्स से जुड़ी दवाओं का सेवन करते हैं.

संस्था से जुड़े डॉक्टर गॉटफ्राइड हिर्नशॉल का कहना है, ''ज़्यादातर ऐसे देश जिन्हें एड्स की रोकथाम करने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है अपने खर्च की सीमा को 0.5 फीसदी से ऊपर नहीं कर पा रहे हैं.''

डॉक्टर हिर्नशॉल का कहना है कि ये इस बात का सबूत है कि वैश्विक मंदी ने एचआईवी जैसी बीमारियों के लिए ज़रूरी बचाव कार्यक्रमों के लिए आर्थिक मुश्किलें पैदा कर दी हैं.

डॉक्टर हिर्नशॉल ने कहा कि इन देशों को चाहिए कि वो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मदद के अलावा अपने संसाधनों को भी इस काम में लाएं और अपने खर्च में बढ़ोत्तरी करें.

डॉक्टर हिर्नशॉल का मानना है कि दुनियाभर में देशों को ये समझना होगा की स्वास्थ और विकास की दृष्टि से किन कार्यक्रमों में निवेश हर कीमत पर ज़रूरी है.

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