पाँच लाख नौकरियों पर कुल्हाड़ी

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ब्रिटेन के वित्त मंत्री जॉर्ज ऑसबॉर्न सरकारी ख़र्चों में कटौती के प्रस्ताव संसद में पेश करते हुए कहा है कि अगले चार वर्षो में लगभग पाँच लाख नौकरियाँ ख़त्म होंगी.

इन कटौती प्रस्तावों को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे गंभीर कहा गया है हालाँकि वित्त मंत्री ने इन्हें निष्पक्षता, सुधार और प्रगति से प्रेरित बताया है.

वित्त मंत्री के इन प्रस्तावों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए विपक्षी लेबर पार्टी के मुख्य वित्त प्रवक्ता एलन जॉन्सन ने आरोप लगाया है कि कंज़रवेटिव पार्टी वैचारिक कारणों से ये कटौतियाँ कर रही है. उन्होंने कहा कि मौजूदा पीढ़ियों की याद्दाश्त में सरकारी ख़र्चों में सबसे गंभीर कटौतियाँ हैं.

जॉर्ज ऑसबॉर्न

ऑसबॉर्न कहा है कि ये सुधार न्यायसंगत होंगे

विभिन्न सरकारी विभागों में औसतन 25 प्रतिशत की कटौती होने का अनुमान किया गया था लेकिन यह कटौती औसतन 19 प्रतिशत है जिसे कुछ तो राहत बताया गया है.

वित्त मंत्री जॉर्ज ऑसबॉर्न ने कॉमन सभा में ये ख़र्च समीक्षा पेश करते हुए कहा कि इन सुधारों के ज़रिए अगले चार वर्षों में 81 अरब पाउंड की बचत की जाएगा.

उन्होंने कहा है कि आर्थिक सुधार की इस योजना से सार्वजनिक ख़र्चों में अनुशासन बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था में स्थिरता आएगी.

उन्होंने घोषणा की कि वर्ष 2015 तक लगभग पाँच लाख सरकारी नौकरियाँ ख़त्म हो जाएंगी जिनमें ज़्यादातर प्राकृतिक तरीक़े से ख़त्म होंगी जबकि कुछ को ज़बरदस्ती ख़त्म किया जाएगा और ज़्यादा प्रभाव शिक्षा, परिवहन, पुलिस और कल्याण मंत्रालयों पर पड़ेगा.

वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि विदेश मंत्रालय के बजट में 24 प्रतिशत की बचत की जाएगी. इसके लिए लंदन में राजनयिकों और कुछ अन्य दफ़्तरों में पदों की कमी की जाएगी.

जॉर्ज ऑसबॉर्न ने ये भी घोषणा की है कि बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का ख़र्च उठाने के लिए बीबीसी की घरेलू सेवा राज़ी हुई है. टेलीविज़न लाइसेंस शुल्क भी छह साल तक फ्रीज़ करने का ऐलान किया गया है जिससे बीबीसी घरेलू सेवा चलती है. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का ख़र्च ब्रितानी विदेश मंत्रालय उठाता है.

जॉर्ज ऑसबॉर्न

ऑसबॉर्न ने कहा कि मज़बूत कंधों वाले लोगों पर ज़्यादा बोझ डाला जाएगा.

उन्होंने कहा कि व्यापार संबंधी मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान रहेगा और सरकार अंतरराष्ट्रीय सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्यों के प्रति ब्रिटेन के संकल्पों को पूरा किया जाएगा.

2020 तक रिटायरमेंट उम्र बढ़ाकर 66 वर्ष कर दी जाएगी. पुलिस के बजट में चार प्रतिशत कटौती होगी तो गृह मंत्रालय को छह प्रतिशत कम बजट में काम चलाना होगा.

अगले चार वर्षों के दौरान अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्रालय का बजट बढ़ाकर साढ़े ग्यारह अरब पाउंड कर दिया जाएगा. स्कूल बजट में भी बढ़ोत्तरी करके इसे 35 अरब पाउंड से 39 अरब पाउंड किया जाएगा लेकिन शिक्षा मंत्रालय को प्रतिवर्ष एक प्रतिशत बचत के लिए संसाधन तलाश करने होंगे.

रक्षा मंत्रालय के बजट में आठ प्रतिशत कटौती की गई है और इसका मतलब है कि अगले पाँच वर्षों में लगभग 42 हज़ार सैन्यकर्मियों की नौकरियाँ ख़त्म हो जाएंगी. इसके अलावा हैरियर जैट, आर्क रॉयल विमान वाहक जहाज़ और निमरूद जैसे जासूसी विमानों की योजना ख़त्म कर दी जाएगी.

हर विभाग अगले एक महीने में रिपोर्ट तैयार करेगा कि अगले चार वर्षों के दौरान ये बचत किस तरह की जाएगी.

विकल्प

ज़ाहिर सी बात है कि नौकरियाँ ख़त्म होंगी तो सरकारी सेवाओं में भी कमी आएगी.

गठबंधन सरकार का कहना है कि सरकारी ख़र्चों में ये विशाल कटौती देश के भारी-भरकम वित्तीय घाटे से निपटने के लिए ज़रूरी हैं और अगर इस समय ठोस क़दम नहीं उठाया गया तो सरकार पर क़र्ज़ बढ़ता ही जाएगा.

विपक्षी लेबर पार्टी और मज़दूर संगठनों का कहना है कि सरकारी ख़र्चों में तेज़ी से कटौती करने से देश के एक बार फिर आर्थिक मंदी में जाने का ख़तरा है.

जॉर्ज ऑसबॉर्न

वित्त मंत्री को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा है

पहला बड़ा सवाल ये है कि सरकार ख़र्चों और बजट में इतनी बड़ी कटौती क्यों कर रही है. इस पर सरकार का कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र की वित्तीय हालत बहुत ख़स्ता है. 2009-2010 वित्तीय वर्ष में बजट घाटा 155 अरब पाउंड पर पहुँच गया है इसका साफ़ अर्थ है कि सरकार ने आमदनी से कहीं ज़्यादा ख़र्च किया.

इसका ये भी मतलब है कि सरकार को आमदनी और ख़र्च में इस बड़ी खाई को भरने के लिए ज़्यादा क़र्ज़ लेना पड़ेगा और इससे पहले से ही मौजूद क़र्ज़ में और बढ़ोत्तरी होगी जिस पर ब्याज भी लगता है और समस्या और गंभीर होती है.

ब्रिटेन सरकार पर अगले कुछ महीनों में लगभग 900 अरब पाउंड का क़र्ज़ चढ़ जाने की संभावना है जो कि देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 70 प्रतिशत होगा. इसलिए सरकार का कहना है कि ख़र्चों में ये बड़ी कटौती करके कुछ क़र्ज़ लौटाना शुरू किया जाएगा जिससे क़र्ज़ का बोझ कुछ कम हो सके.

आमदनी और ख़र्च के बीच की खाई को भरने के लिए अगर सरकार ख़र्चों में कटौती नहीं करती तो उसे टैक्स बढ़ाने पड़ते. टैक्स कुछ हद तक बढ़ाए तो जा रहे हैं लेकिन वो 86 अरब पाउंड के लक्ष्य की सिर्फ़ एक चौथाई राशि मुहैया करा पाते हैं.

लेबर पार्टी का कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था बहुत नाज़ुक है और सरकारी ख़र्चों में अगर इतने बड़ी कटौती से अर्थव्यस्था को उबरने में लंबा समय लग सकता है.

लेबर पार्टी का ये भी कहना है कि इन कटौतियों से देश में बेरोज़गारी बढ़ेगी जिससे समस्या गंभीर ही होगी. अलबत्ता आर्थिक विशेषज्ञ इस पर विभाजित हैं कि आर्थिक मंदी पर इस कटौती का क्या असर हो सकता है.

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