क्या सौगात लाएंगे बराक ओबामा?

अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा का स्वरुप जो नज़र आ रहा है उसको भारत के नज़रिए से देखें तो जो बाते सबसे ज़्यादा महत्व रखती है वो है कि बराक ओबामा साफ़ शब्दों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता की वकालत करें.

पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर कहते हैं, “सरकारी स्तर पर भारत से कोई ऐसी बातचीत नहीं हुई है. मेरी आशा है कि वो यहां ऐसी बात करेंगे, या भारत की मदद करेंगे. अगर उन्होंने कुछ कहा तो उसका अच्छा असर होगा.”

अमरीकी मामलों के विशेषज्ञ और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चिंतामणि महापात्र को हालांकि विश्वास है कि ओबामा भारत के सुरक्षा परिषद में स्थान पर कोई बयान दे भी दें, पर वे भी मानते है कि ये काफ़ी नहीं होगा क्योंकि भारत की सदस्यता संयुक्त राष्ट्र के देशों के रवैये पर टिकी है.

ओबाम के इस दौर पर हो सकता है कि भारत के कुछ प्रतिरक्षा विभागों, खासकर इसरो और डीआरडीओ पर भारत के 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद लगे प्रतिबंध हटे.

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चिंतामणि महापात्र का मानना है, “डीआरडीओ और इसरो पर लगे प्रतिबंध सामरिक साझेदारी की भावना के ख़िलाफ़ है इसलिए उम्मीद की जा रही है कि ओबामा भारत आ कर इन दोनों को नेगेटिव लिस्ट से निकालने की घोषणा करेंगे.”

साथ ही भारत चाहेगा कि कश्मीर की चर्चा ओबामा कश्मीर की चर्चा न करें और पाकिस्तान से हो रहे आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाए.

भारत आतंकवाद पर सूचना के आदान प्रदान में ज़्यादा सहयोग भी चाहता है विशेषकर इन ख़बरों के बाद कि डेविड कोलमैन हैडली और मुंबई में हुए 26 नवंबर के हमले में उसकी भूमिका की जानकारी भारत को ठीक समय पर नहीं दी गई थी.

अमरीका के वीज़ा फ़ीस बढ़ाने और आउटसोर्सिंग जैसी चिंताओं पर भी भारत कुछ सकारात्मक क़दम चाहता है.

अमरीका की उम्मीदें

अमरीका की नज़र से देखें तो परमाणु व्यापार की राह तैयार करने के लिए भारत की संसद से पारित परमाणु उत्तरदायित्व विधेयक से उभरी दिक्कतों को दूर करना अहम है.

अमरीका का कहना है कि अगर इस क़ानून को नहीं बदला जा सकता तो ऐसा प्रावधान कर दिया जाए कि अमरीकी कंपनियों को किसी दुर्घटना के बाद मुआवज़ा न देना पड़े.

मंदी की मार झेल रहे अमरीका की नज़र अपनी प्रतिरक्षा कंपनियों को कुछ ठेके दिलवाने, परमाणु संयंत्र और व्यापार क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर रहेगी.

अमरीका कृषि क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाना चाहता है पर फ़िलहाल उसके दुग्ध और मांस उत्पादों पर भारत में प्रतिबंध हटना मुमकिन नहीं लग रहा है क्योंकि भारतीय अधिकारियों का कहना है कि उन उत्पादों में गौ अंश इस्तेमाल किए जाते हैं.

यानि सीधी बात ये कि ओबामा की इस यात्रा में चाहे प्रतिरक्षा, कृषि, उच्च तकनीक, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग का मामला हो पर जार्ज बुश या बिल क्लिंटन की यात्राओं जैसा उत्साह नहीं है.

जेएनयू के चिंतामणि महापात्र का कहना है, “अमरीका और भारत के संबंध इतने व्यापक और बहुआयामी हो गए है कि ज़रुरत से ज़्यादा कोई आशा नहीं की जा रही. दूसरी बात ये कि बुश परमाणु संधि का बड़ो तोहफा लाए थे पर ओबामा के पास ऐसी बड़ी कोई सौगात नहीं है. अब बस उस समझौते को लागू करना ही एजेंडे पर है इसलिए उत्साह उतना नज़र नहीं आ रहा है.”

पर ओबामा अपने कार्यकाल के शुरुआती दौर में वाणिज्य जगत के 200 लोगों के भारी भरकम दल के साथ भारत आ रहे हैं, उसे अमरीका के लिए भारत के महत्व के परिचायक के रुप में देखा जा रहा है.

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