अमरीकी सेना में एक सिख अधिकारी की भर्ती

सिमरन लाम्बा

अमरीकी सेना में कई सालों में पहली बार एक सिख अफ़सर को भर्ती किया गया है.

26 साल के सिमरन लाम्बा अपनी पगड़ी और दाढ़ी रख सकते हैं. अमरीकी सेना में भर्ती होने के लिए दाढ़ी और पगड़ी हटानी पड़ती है जिसके कारण सिख धर्म के ज़्यादातर लोग सेना में जाने से इनकार करते आए हैं.

लेकिन अमरीकी सेना की नीतियों में बदलाव के नतीजे में उन्हें भर्ती नहीं किया गया है बल्कि सेना को हिंदी और पंजाबी बोलने वाले अफ़सरों की ज़रुरत थी इसलिए सिमरन लाम्बा को दाढ़ी और पगड़ी रखने की छूट दी गई है.

सिमरन लाम्बा को अब अमरीकी नागरिकता भी मिल गई है. वह नई दिल्ली से अमरीका आए थे.

अमरीका में सिख समाज ने इस क़दम का स्वागत किया है.

सिख कोअलिशन नामी एक संस्था की अधिकारी हरसिमरन कौर इस ख़बर से बहुत खुश हैं. उनका कहना है, " हम सब इस ख़बर से उत्तेजित हैं, बहुत खुश हैं. हम अमरीकी सेना के एहसान मंद हैं कि सिखों के प्रति उनका नज़रिया बदल रहा है."

सिमरन लाम्बा अमरीकी सेना में ट्रेनिंग ख़त्म कर चुके हैं और वह बुधवार से अमरीकी सेना के एक सदस्य बन गए. अब उन्हें युद्ध के मैदान में कहीं भी भेजा सकता है.

इस साल दो सिखों को सेना में भर्ती किया गया था लेकिन युद्ध के लिए नहीं. वह पूरी तरह से सेना का हिस्सा भी नहीं बनाए गए थे.

अमरीकी सेना में भगत सिंह सिन्धु नाम के अफ़सर पहले सिख अफ़सर थे जो पहले वर्ल्ड वार में अमरीकी सेना की तरफ से लड़े थे.

हरसिमरन कौर के अनुसार सिखों ने सालों तक अमरीकी सेना में काम किया है लेकिन 80 के दशक में अमरीकी क़ानून के बदलाव के बाद सिखों को सेना में भर्ती नहीं किया जाता था.

अमरीकी सेना ने 1984 में दाढ़ी, किरपान और पगड़ी वालों को भर्ती करना बंद कर दिया था.

सेना की यह नीति आज भी प्रचलित है. हरसिमरन कौर के अनुसार उनकी संस्था सालों से किरपान, दाढ़ी और पगड़ी के ख़िलाफ़ लगी पाबंदियों को ख़त्म कराने के लिए आन्दोलन चला रही है.

अमरीका में सिख

अमरीका में सिखों के ख़िलाफ़ काफ़ी ग़लतफ़हमियाँ हैं. इसकी वजह यह है की अपने धर्म के अनुसार वह लम्बी दाढ़ी रखते हैं और सर पर पगड़ी बांधते हैं और अमरीका में 9 /11 के हमलों के बाद से आम अमरीकी जनता उन्हें उनके हुलिए के कारण तालिबान या अल-क़ायदा का सदस्य समझ कर उन पर हमले भी करती रही है.

एअरपोर्ट और सीमा चेक पोस्ट पर उनकी पगड़ियों को निकाल कर उनकी फ्रिस्किंग की जाती है जिससे उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचती है.

सिखों ने अमरीकी प्रशासन का इस तरफ़ कई बार ध्यान आकर्षित किया है.

हरसिमरन कौर के अनुसार अमरीकी प्रशासन और अमरीकी जनता के बीच उनकी संस्था इन ग़लतफ़हमियों को दूर करने की अनेक कोशिशें कर रही है लेकिन अब तक कोई ख़ास सफलता उन्हें नहीं मिली है.

कनाडा और अमरीका में सिख समाज काफ़ी संख्या में है और वह हर मैंदान में अच्छा कर रहे हैं.

पिछले सप्ताह निक्की हेली, जिनका असल नाम, निम्रता रंधावा है, दक्षिण कैरोलाइना अमरीकी राज्य की राज्यपल चुनी गई थीं. उनके माता पिता सिख हैं और वह अमृतसर से अमरीका आए थे. 38 साल की निक्की उस समय सिर्फ़ एक साल की थीं.

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