सू ची रिहा, रविवार को भाषण देंगीं

रिहाई के बाद अपने घर की बालकनी पर आंग सान सू ची
Image caption रिहाई के बाद अपने घर की बालकनी पर आंग सान सू ची

शनिवार को रिहा हुईं बर्मा की लोकंतत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची के वकीलों का कहना है कि सरकार ने सू ची को रिहा करने के बदले देश में घूमने-फिरने या राजनीति करने पर रोक जैसी कोई शर्त नहीं लगाई.

सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी से अलग हुए एक धड़े के नेता खिन मांउग स्वे ने कहा है कि है सू ची की रिहाई बर्मा में सभी लोकतांत्रिक गुटों के लिए उत्सहावर्धक ख़बर है.

लेकिन बर्मा में मौजूद बीबीसी संवाददाता के अनुसार शायद सत्तारूढ़ जनरल ये मानते हैं कि सू ची अब उनकी योजनाओं के लिए कोई ख़तरा नहीं है, क्योंकि अगर सैन्य प्रशासक उसे ख़तरा समझते तो कभी रिहा नहीं होने देते.

इससे पहले शनिवार रिहाई के बाद सू ची ने अपने घर के बाहर जुटे समर्थकों का आभार जताया और उनसे एकजुट रहने का आह्वान किया.

उन्होंने अपने समर्थकों से रविवार को पार्टी मुख्यालय में आने के लिए कहा है जहाँ वे उन्हें संबोधित करेंगी.

सू ची ने रिहाई के बाद अपनी बालकनी पर आकर कहा,"हमने एक-दूसरे को लंबे समय से नहीं देखा है तो हमें बहुत कुछ कहना-सुनना है.

"अगर आपको मुझसे कुछ कहना है तो आप कल पार्टी मुख्यालय आइए, तो हम वहाँ बात कर पाएँगे और तब मैं लाउडस्पीकर का भी इस्तेमाल करूँगी."

इतना कहने के बाद सू ची अपनी पार्टी - नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी - के वरिष्ट सदस्यों के साथ अपने घर के भीतर चली गईं. पिछले सात वर्षों से वे इस घर में नज़रबंद हैं.

सू ची की रिहाईः तस्वीरें

बर्मा की सैनिक सरकार ने 65 वर्षीया आंग सान सू ची को पिछले 21 वर्षों में से 15 वर्ष किसी ना किसी कारण से उनके घर पर नज़रबंद रखा है.

सू ची की रिहाईः वीडियो

सू ची की रिहाई पिछले वर्ष ही होनी थी लेकिन पिछले साल एक नाटकीय घटना के बाद उनकी नज़रबंदी को और डेढ़ वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया जब एक अमरीकी व्यक्ति एक झील में तैरकर उनके घर चला गया था.

रिहाई

Image caption सू ची की रिहाई के बाद रंगून में उनके घर के बाहर झूमते समर्थक

नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त नेता सू ची की नज़रबंदी की डेढ़ साल की अवधि शनिवार शाम समाप्त हो रही थी लेकिन सैनिक अधिकारी उन्हें रिहा करते हैं या नहीं इसे लेकर कई तरह की अटकलें लग रही थीं.

बड़ी संख्या में उनके समर्थक सू ची के घर के बाहर जमा थे.

फिर ख़बर आई कि बर्मी अधिकारियों ने सू ची की नज़रबंदी समाप्त करने का आदेश पढ़कर सुनाया है, इसके बाद सू ची के घर के बाहर लगे सुरक्षा अवरोध हटाए जाने लगे और वहाँ तैनात दंगारोधी पुलिस की गाड़ियाँ वापस लौटने लगीं.

इसके बाद समर्थक समझ गए कि उनकी नेता को रिहा किया जा रहा है और फिर वे अपने नेता के घर की ओर दौड़ पड़े़.

थोड़ी देर बाद सू ची ने अपने घर के मुख्यद्वार के पास आकर गेट पर लगे लोहे की सलाखों को पकड़कर पीछे से ही अपने समर्थकों की ओर देखकर हाथ हिलाया.

उनके साथ उनकी पार्टी – नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी - के वरिष्ठ नेता खड़े़ थे.

इसके बाद सू ची ने मुस्कुराते हुए, हाथ हिलाकर अपने समर्थकों से एकजुट रहने और कल पार्टी मुख्यालय आने के लिए कहा जो उनके घर के पास ही है.

लोकतंत्र की लड़ाई

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता सू ची अब 65 वर्ष की हो गईं हैं. वे पिछले 21 सालों में से 15 साल नज़रबंद रही हैं.

सू ची को पिछले साल ही रिहा किया जाना था लेकिन डेढ़ साल पहले एक अमरीकी नागरिक झील पार करके चुपचाप उनके घर चला आया था. इसके बाद सेना ने एक विदेशी को शरण देने के आरोप में सू ची की नज़रबंदी की अवधि डेढ़ साल बढ़ा दी थी.

बर्मा में पिछले रविवार को ही 20 साल बाद चुनाव हुए हैं.

इसके बाद सरकारी मीडिया ने घोषणा की है कि अब तक मिले नतीजों से ज़ाहिर होता है कि सेना समर्थित पार्टी यूनियन सॉलिडरिटी एंड डवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) ने दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लिया है.

इसके अनुसार यूएसडीपी ने 330 सीटों वाले निचले सदन की अब तक घोषित 219 सीटों में से 190 सीटें जीत ली हैं. इसी तरह से 168 सीटों वाले उच्च सदन के लिए अब तक 107 सीटों के नतीजे घोषित हुए हैं जिसमें से 95 पर यूएसडीपी को विजयी घोषित किया गया है.

जो लोग इसमें विजयी घोषित किए गए हैं उसमें प्रधानमंत्री थेन सेन भी हैं जो अप्रैल में ही सेना में जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं.

सैनिक सरकार ने कहा है कि इन चुनावों से देश सैन्य शासन से लोकतंत्र में चला गया है.

लेकिन विपक्ष और कई पश्चिमी देशों ने कहा है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं थे.

सू ची की पार्टी एनएलडी ने 1990 में चुनाव जीता था लेकिन उसे कभी सत्ता संभालने का अवसर नहीं दिया गया.

अब इस पार्टी ने फिर से चुनाव में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया तो उसकी मान्यता ही रद्द कर दी गई.

वर्तमान नियमों के अनुसार दोनों सदनों की 25 प्रतिशत सीटें सेना के लिए आरक्षित रहेंगीं और संविधान में किसी भी परिवर्तन के लिए 75 प्रतिशत या दो तिहाई बहुमत की ज़रुरत होगी. इससे साफ़ है कि सेना के बिना परिवर्तन संभव नहीं है.

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