एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर संधि

एस एम कृष्णा
Image caption एस एम कृष्णा शंघाई सहयोग समिति की बैठक में शामिल हैं

भारत ने चीन और रूस के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है जिसमें एशिया-प्रशांत महासागर क्षेत्र से अमरीका और जापान के प्रभाव को कम करने के संकेत दिए गए थे.

चीन और रूस ये चाहते थे कि एशिया-प्रशांत महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और सहयोग के लिए एक व्यवस्था तैयार की जाए, लेकिन भारत का कहना था कि इस तरह की कोई भी योजना अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर तैयार होनी चाहिए और इस काम में पूरी पारदर्शिता रखे जाने की ज़रूरत है.

ये प्रस्ताव चीन के शहर वुहान में चर्चा में आया जहाँ तीनों देशों के विदेश मंत्री शंघाई सहयोग समूह की एक बैठक के लिए पिछले दो दिनों से जमा हैं.

शंघाई सहयोग समिति मुख्यत मध्य एशियाई देशों का एक समूह है जिसे चीन और रूस के ज़रिये अमरीका और जापान के प्रभाव को रोकने की एक कोशिश के तौर पर देखा जाता है.

भारत इस समूह में पर्यवेक्षक की हैसियत से शामिल है.

तीनों देशों ने सोमवार को एक साझा घोषणापत्र जारी किया जिसमें कहा गया है कि एशिया-प्रशांत महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और सहयोग को लेकर एक खुली और संतुलित संरचना तैयार की जाएगी जिसमें सभी देशों के ज़ायज़ हितों का ध्यान रखा जाएगा.

तीनों विदेश मंत्रियों ने कहा है कि इस मामले का अध्ययन विशेषज्ञों से करवाया जाना चाहिए.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार सिद्धार्थ वर्दराजन मानते हैं कि ऐसा रुख़ अपनाकर भारत ने एक तरह से अमरीका की वकालत की है.

चीन से सिद्धार्थ वर्दराजन ने बताया कि भारत ने ये साफ़ किया है कि एशियाई क्षेत्र में अमरीका की दिलचस्पी स्वभाविक है और आप इस मामले में एकतरफ़ा रवैया नहीं अख़्तियार कर सकते हैं.

घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावशाली बनाए जाने पर ज़ोर दिया गया हैं. तीनों देशों ने आपसी व्यापार, ऊर्जा और सामरिक सहयोग को बढ़ाने की बात भी कही है.

जलवायु परिवर्तन भी इस घोषणापत्र का हिस्सा है.

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