'बर्मा में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं थे'

आंग सान सू ची
Image caption सात नवंबर को हुए चुनावों में राजधानी रंगून में एक मतदान केंद्र

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार समिति ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा है कि बर्मा में बीस साल बाद हुए चुनाव ना तो स्वतंत्र थे और ना ही निष्पक्ष.

लेकिन चीन ने बर्मा का ये कहते हुए बचाव किया है कि इस समय सैनिक सरकार पर उंगली उठाने से मानवाधिकारों की रक्षा नहीं होगी.

सेना के समर्थन वाली सरकार ने इन चुनावों में जीत हासिल की थी जिनमें विपक्षी दलों और उनके उम्मीदवारों पर कई प्रकार प्रतिबंध लगाए गए थे.

कई वर्षों बाद जेल से रिहा हुई लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची ने इन चुनावों के वहिष्कार का आहवान किया था.

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार समिति के इस प्रस्ताव में सैनिक सरकार से लोकतंत्र की ओर बढ़ने के लिए सू ची के साथ वार्तालाप करने का अनुरोध किया है.

मानवाधिकार समिति ने कहा है कि उन्हें दुख है कि सैनिक सरकार ने चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाए थे.

जेल से रिहा होने के बाद लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची ने सैनिक प्रशासक जनरल थान श्वे ने मिलने की इच्छा ज़ाहिर की है.

संयुक्त राष्ट्र की समिति ने सू ची की रिहाई का स्वागत करते हुए सेना से आग्रह किया है कि वो सू ची की वार्तालाप की पेशकश को स्वीकार करे.

यूरोपीय संघ, अमरीका और अन्य पश्चिम देशों के समर्थन वाले इस प्रस्ताव में बर्मा मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता के हनन की आलोचना की है.

प्रस्ताव में मनमानी गिरफ़्तारियों, लोगों को बलपूर्वक ग़ायब करने, बलात्कार और अन्य प्रकार की यौन हिंसा,प्रताड़ना और क्रूर अमानवीय व्यवहार और अपमानजनक सज़ा की गहरी चिंता व्यक्त की है.

इस प्रस्ताव का 96 में से चीन और रूस समेत 28 देशों ने विरोध किया.

चीन ने बचाव किया

समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार चीन के प्रतिनिधि ने कहा कि प्रस्ताव बर्मा में हाल में प्रगति को प्रतिबिंबित नहीं करता. संयुक्त राष्ट्र में बर्मा के राजदूत थान श्वे ने भी अपनी सरकार की आलोचना को ख़ारिज करते हुए कहा है कि प्रस्ताव का कोई 'नैतिक आधार' नहीं है.

बीस वर्ष बाद सात नवंबर को हुए चुनावों में सेना समर्थित राजनीतिक दल यूनियन सॉलीडेरिटी ऐंड डव्लेपमेंट पार्टी ने जीते थे.

संबंधित समाचार