अमरीका में राजनीतिक चक्का-जाम

Image caption राष्ट्रपति ओबामा के पास अब एक ही रास्ता है और वो है रिपब्लिकन्स से समझौता करना.

राष्ट्रपति बराक ओबामा इन दिनों काफी परेशानी में हैं, क्यूंकि अमरीका में आजकल राजनीतिक चक्का-जाम है.

अमरीकी संसद के रिपब्लिकन पार्टी के सभी सदस्य और डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य कोई भी कानून पास नहीं होने दे रहे हैं.

कांग्रेस में कई बिल पारित होने के लिए पड़े हुए हैं जैसे, अमरीका और रूस के बीच एक सैन्य समझौते को मंज़ूरी दी जानी है.

इसके अलावा समलैंगिक लोगों की खुले तौर पर अमरीकी सेना में भर्ती पर पाबंदी को हटाने के लिए भी एक बिल पारित किया जाना है.

रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों का कहना है की जब तक राष्ट्रपति बराक ओबामा बुश के दौर में अमीरों के लिए दिए गए आय कर में छूट की अवधि को नहीं बढाते, तब तक वो कांग्रेस (अमरीकी संसद) ख़ासतौर से सीनेट में कोई बिल पारित नहीं होने देंगे.

अमीरों को आयकर में छूट दिए जाने के प्रावधान की अवधि इस महीने ख़त्म हो रही है.

ओबामा के लिए चुनौती ये भी है कि वो अपने चुनावी वादों को पूरा करें ताकि वो दो साल बाद फिर से राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ सकें. लेकिन रिपब्लिकन पार्टी उनकी राह में रोड़े अटकाने की पूरी कोशिश कर रही है.

राष्ट्रपति ओबामा के पास अब एक ही रास्ता है और वो है रिपब्लिकन्स से समझौता करना.

उन्हें रिपब्लिकन पार्टी की कुछ मांगों को पूरा करना ही पड़ेगा तभी वो सीनेट में फंसे बिल को पारित करा सकते हैं. ये अमरीका के राजनीतिक दांवपेंचों का एक नमूना है.

सपनों के सौदागर

अमरीका उन चंद देशों में से एक है जहां कोई बड़ा सपना देखे और इसे पाने की लगन दिखाए तो सपना पूरा हो सकता है.

लेकिन कभी-कभी कोई बड़ा सपना देखे बग़ैर स्कूल और कॉलेज में कुछ न हासिल कर सके छात्रों को भी बड़ा पद, बड़ी लोकप्रियता और करोड़पति बनने का मौका मिल जाता है.

पिछले दिनों फेसबुक के मुख्य कार्यालय में ऐसे ही दो लोग मंच पर आमने सामने बातें करते नज़र आए.

राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और फेसबुक के 26 वर्षीय मालिक मार्क जुकरबर्ग दोनों कोई बहुत बड़ा सपना देखने वाले छात्र नहीं थे.

यहां तक की बुश तो खराब छात्रों की गिनती में आते थे. उनके पिता को उम्मीद नहीं थी कि वो जीवन में कुछ भी कर पायेंगे.

राष्ट्रपति बुश अपनी नई किताब डिसीशन प्वाइंट्स के प्रचार के लिए फेसबुक के लाइव चैट में भाग लेने आये थे.

लाइव चैट के ज़रिए उनसे बात कर रहे थे खुद मार्क जुकरबर्ग. मार्क पत्रकार नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद उन्होंने बुश से काफ़ी खुल कर सवाल किए.

मैंने राष्ट्रपति बुश को इतने मज़ाकिया मूड में पहले कभी नहीं देखा था जितना वो इस साक्षात्कार के दौरान नज़र आ रहे थे.

दोनों में ज़बरदस्त केमिस्ट्री नज़र आ रही थी. छः साल पहले मार्क ने फेसबुक लाँच किया था और आज इसके 50 करोड़ सदस्य हैं.

छः साल पहले कौन कह सकता था की एक छात्र अपने कॉलेज के हॉस्टल से इतनी बड़ी कंपनी की शुरुआत कर सकेगा.

दूसरी तरफ जब बुश कॉलेज में पढ़ रहे थे तो उनके पिता को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका 'नाक़ाबिल' बेटा एक दिन अमरीका का राष्ट्रपति बनेगा.

कहा जाता है अमरीका में सबको अवसर मिल सकता है और ये शख्सियतें इसका जीता जागता उदाहरण हैं.

‘टिप कल्चर’

भारत में बख़्शीश का रिवाज़ मुग़लों के दौर में भी था लेकिन इसे अंग्रेज़ों ने खूब बढ़ावा दिया और अब यह हमारे समाज का हिस्सा बन गया है. लेकिन अमरीका बख़्शीश या टिप देने के रिवाज़ में सभी देशों से आगे नज़र आता है.

आप भले ही न मानें लेकिन मेरी तनख्वाह के 150 डॉलर हर महीने टिप देने में खर्च हो जाते हैं.

आप सोचते होंगे कि टिप देना ज़रूरी नहीं है तो टिप क्यों दी जाए, लेकिन अमरीका में ये ज़रूरी मालूम होता है.

मैंने एक दिन एक रेस्त्रां में कुछ पीने को मंगाया. वेटर लेकर आया और मैंने पैसे दे दिए लेकिन टिप नहीं छोड़ा.

कुछ देर बाद मैंने फिर कुछ आर्डर करने के लिए वेटर को बुलाया लेकिन उसकी निगाहें मेरे बाद कतार में खड़े लोगों पर टिकी थीं.

काफ़ी समय तक जब वो मुझे नज़रअंदाज़ करता रहा तो मैंने गुस्से में कहा कि मेरा आर्डर लेने में इतनी देर क्यों की जा रही है.

उसने फ़ौरन पलटकर जवाब दिया कि मैंने टिप नहीं दी थी इसलिए वो सुन नहीं रहा हैं. उसके इस जवाब को सुनकर मैं हैरान रह गया.

इसी तरह से एयरपोर्ट के लिए टैक्सी मंगाते समय टैक्सीवाले ने फोन पर कहा 40 डॉलर. मैंने शुक्रिया कहकर फोन रखना चाहा तभी उसने मुझसे पूछा, ''सर टिप इसी में जोड़ दूं या आप ड्राइवर को कैश देना चाहेंगे.''

मैंने हैरान होते हुए पूछा कितनी टिप, तो उसने कहा 40 डॉलर के हिसाब से छह डॉलर ठीक रहेगा.

इस ‘टिप कल्चर’ से तो मैं बच नहीं सकता. सोचता हूं अपनी तनख्वाह बढ़ाने की अर्ज़ी ही दे दूं.

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