श्याबाओ की रिहाई की अपील

दो पूर्व नोबेल शांति पुरस्कार विजेताओं ने चीन से अपील की है कि वो मानवाधिकार कार्यकर्ता लू श्याबाओ को रिहा करे ताकि वे शुक्रवार को होने वाले पुरस्कार समारोह में हिस्सा ले सकें.

आर्चबिशप डेसमंड टूटू और वैस्लाव हावेल ने कहा है कि चीन सही मायने में तब तक दुनिया का नेता नहीं बन सकता, जब तक वो मानवाधिकार हनन को नहीं रोकता.

लू श्याबाओ को इस साल का नोबेल शांति पुरस्कार मिला है. ओस्लो में शुक्रवार को ये पुरस्कार दिया जाना है. लेकिन लू श्याबाओ इस समय चीन की जेल में बंद हैं.

वर्ष 2009 में उन्हें 11 साल जेल की सज़ा सुनाई गई थी. उन पर आरोप है कि उन्होंने देशद्रोह भड़काने की कोशिश की.

तर्क

डेसमंड टूटू और हावेल का तर्क है कि चीन को मानवाधिकार हनन रोकना चाहिए ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी विश्वसनीयता क़ायम हो सके.

ब्रितानी अख़बार द ऑब्जर्वर में इन दोनों ने लिखा है, "हालाँकि श्याबाओ की कहानी एक अरब से ज़्यादा लोगों में से एक व्यक्ति की कहानी है, लेकिन ये व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के प्रति चीन की सरकार की असहिष्णुता का प्रतीक है."

दोनों ने हाल के वर्षों में चीन की आर्थिक प्रगति की सराहना तो की लेकिन उन्होंने कहा कि चीन की सरकार उस अत्याचारी शासन और क्रूर शक्ति का समर्थन करती है, जिसके तहत विरोध के स्वरों को दबा दिया जाता है.

डेसमंड टूटू और हावेल का कहना है कि इससे यही साबित होता है कि चीन में अब भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है.

इन दोनों ने चीन पर ये भी आरोप लगाया कि वो दूसरे देशों में भी मानवाधिकार हनन का समर्थन करता है.

संबंधित समाचार