जलवायु: भारत-चीन अलग-थलग पड़े

कानकुन सम्मेलन
Image caption गुरुवार को सम्मेलन का अंतिम दिन है

जलवायु परिवर्तन के मामले में भारत और चीन अपने दो अन्य मित्र देशों ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका से अलग होते दिखाई पड़ रहे हैं.

ये चारों विकासशील देश जलवायु परिवर्तन को लेकर साझा लड़ाई लड़ते रहे हैं.

कानकुन जलवायु सम्मेलन में भारत और चीन इस समय क़ानूनी रुप से बाध्यकारी किसी समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं हैं. इसी वजह से विकासशील देशों के इस गुट (बेसिक) में दरार आई है.

ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका क़ानूनी रुप से बाध्यकारी समझौते पर हस्ताक्षर करने की वकालत कर रहे हैं.

यह समझौता कार्बन उत्सर्जन की सीमा तय करने के लिए होना है और यह क्योटो प्रोटोकॉल की जगह लेगा जिसकी समय सीमा वर्ष 2012 में ख़त्म हो रही है.

क्योटो प्रोटोकॉल पर वर्ष 1997 में सहमति बनी थी. इस समझौते में यह सहमति बनी थी कि कार्बन गैसों के उत्सर्जन के लिए विकसित देश ज़िम्मेदार हैं.

अमरीका ने इस समझौते पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए क्योंकि उसे इस बात की आपत्ति है कि कार्बन उत्सर्जन में तेज़ी से वृद्धि कर रहे भारत और चीन जैसे देशों को क्योटो समझौते से अलग रखा गया है.

भारत का रुख़

मैक्सिको के कानकुन में हो रहे सम्मेलन में भारत, चीन और अमरीका कह रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन पर क़ानूनी रुप से बाध्यकारी समझौता नहीं होना चाहिए.

जबकि जी77 में शामिल दूसरे विकासशील देश और कम विकसित अफ़्रीकी देश इसके पक्ष में सहमत हो गए हैं.

भारत कहता आया है कि यदि विकासशील देशों को भी क़ानूनी रुप से बाध्यकारी समझौते के दायरे में लाया गया तो इससे विकासशील देशों की प्रगति में बाधा आएगी.

भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा है कि भारत इस समय क़ानूनी रुप से बाध्यकारी किसी समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार नहीं है. उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत का दृष्टिकोण अभी विकसित हो रहा है और अभी इसे और विकसित होना है.

Image caption जयराम रमेश ने कहा है कि भारत को विचार करने का समय देना चाहिए

समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार उन्होंने कहा, "भारत इस समय क़ानूनी रुप से बाध्यकारी किसी समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं है क्योंकि हम नहीं जानते कि इस समझौता का प्रारूप क्या होगा, इसका पालन न कर पाने पर दंड किस तरह का होगा और निगरानी की क्या पद्धति होगी."

उन्होंने कहा, "इसलिए हमें इंतज़ार करना चाहिए और इस पर चर्चा करनी चाहिए."

यह कहते हुए कि भारत अभी क़ानूनी रुप से बाध्यकारी किसी समझौते के लिए इस समय तैयार नहीं है, उन्होंने कहा कि समुचित क़ानूनी रुप में सभी देशों को क़ानूनी रुप से बाध्यकारी समझौते को स्वीकार करना चाहिए.

उनके इस बयान को भारत के रुख़ पर परिवर्तन के रुप में देखा जा रहा है.

अमरीका, यूरोपीय संघ और जापान भारत पर यह दबाव डालते रहे हैं कि उसे क़ानूनी रुप से बाध्यकारी समझौते पर हस्ताक्षर कर देने चाहिए.

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