अमरीका करे अल-काय़दा का सफाया

बराक ओबामा
Image caption बराक ओबामा ने अफ़गानिस्तान नीति पर जारी की गई समीक्षा रिपोर्ट में तालिबान और अल-काय़दा के ख़िलाफ़ प्रगति पर संतुष्टि जताई .

पिछले दिनों अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफ़गानिस्तान नीति पर समीक्षा रिपोर्ट जारी की.

इस रिपोर्ट में तालिबान और अल-काय़दा के ख़िलाफ़ प्रगति पर संतुष्टि जताई गई.

पाकिस्तान की मदद को सराहा गया लेकिन पाकिस्तान से शिकायत भी की गई कि वहां अल-काय़दा के कई ठिकाने अब भी मौजूद हैं.

राष्ट्रपति ने कहा पाकिस्तान को अब समझ में आ रहा है कि आतंक के ठिकाने न केवल दूसरे देशों के लिए ख़तरा हैं बल्कि ख़ुद पाकिस्तान के लिए एक बड़ा ख़तरा हैं.

इस रिपोर्ट के जारी होने के बाद अमरीकी रेडियो और टेलिविज़न नेटवर्क पर इस मुद्दे पर ज़ोरदार बहस छिड़ गयी.

अमरीका में एक विश्लेषक ने कहा कि अमरीका के लिए अफ़गानिस्तान की सरकार और स्थानीय प्रशासन को मज़बूत बनाना एक बड़ी चुनौती ज़रूर है लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती है पाकिस्तान के अंदर तालिबान और अल-काय़दा आतंकियों का सफ़ाया करना.

उनका कहना था अमरीका के लिए अफ़गानिस्तान उतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी बड़ी समस्या पाकिस्तान है.

इस विशेषज्ञ ने अमरीका को कई सुझाव भी दिए हैं. इसके तहत अमरीका पाकिस्तान के अंदर केवल ड्रोन हमले न करें बल्कि उत्तर वज़ीरिस्तान में अमरीकी सैनिक अल-काय़दा और तालिबान के ख़िलाफ़ जाकर ऑपरेशन करे.

Image caption लैरी किंग ने कई जानी-मानी हस्तियों का साक्षात्कार किया है.

एक आम आदमी ने एक रेडियो प्रोग्राम के होस्ट को फोन करके कहा कि अमरीका का उद्देश्य था अल-काय़दा और उसके नेता ओसामा बिन लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ना. नौ साल में यह नहीं हो सका है. "हमारे राष्ट्रपति क्यों सफलता के दावें कर रहे हैं?"

उसने कहा अल-काय़दा पाकिस्तान में छिपा हुआ है यह सब को मालूम है तो उसे पकड़ने में और कितने साल लगेंगे?

लैरी किंग

टीवी होस्ट लैरी किंग सीएनएन के साथ पच्चीस सालों तक काम करने के बाद अब रिटायर हो गए हैं. दुनिया भर में जहाँ कहीं भी लोग सीएनएन देखते हैं वो लैरी किंग को ज़रूर जानते होंगे. उनके चाहने वाले कई देशों में हैं. मैंने जब से सीएनएन देखना शुरू किया है तब से उनके चेहरे को पहचानता हूँ. सीएनएन को प्रसिद्ध करने में बेशक उनका हाथ भी है.

न्यूयॉर्क के नागरिक लैरी किंग ने अमरीका के बड़े बड़े नेताओं और मनोरंजन जगत की सभी बड़ी हस्तियों से अपने कार्यक्रम में साक्षात्कार किया.

वो दो कारणों से याद रखे जायेंगे.

एक तो ये कि वो अपने कार्यक्रम में नेताओं से नरमी से सवाल करते थे और दूसरे कि वो एक ही कार्यक्रम में एक प्रसिद्ध नेता से राजनीति के अहम मुद्दों पर बात करने के बाद दूसरे क्षण हॉलीवुड की अभिनेत्रियों से मनोरंजन जगत की बातें भी उतनी ही सरलता से करते थे.

यह बात अमरीकियों को बहुत पसंद आती है. लेकिन उनकी यही दो खूबियां कुछ लोगों की नज़र में उनकी कमज़ोरियां भी थीं.

उनके आलोचक कहते हैं कि वो अपने कार्यक्रम में नेताओं से कड़े सवाल नहीं करते थे. उनके आलाचकों के अनुसार एक ही कार्यक्रम में राजनीति और मनोरंजन जगत की बातें करना अहम् मुद्दों की खिल्ली उड़ाने की तरह है. शायद उन्हें पसंद करने वाले और उनकी आलोचना करने वाले दोनों अपनी जगह पर सही हों लेकिन एक बात तो है कि वह बड़ी-बड़ी हस्तियों का साक्षात्कार करते करते खुद भी एक बड़ी शख़्सियत बन गए हैं.

भिखारी

जब मैं मुंबई में था तो पश्चिमी देशों के मेरे दोस्त भीख मांगने वालों के बारे में काफी शिकायत करते थे और भिखारी भीख मांगने आता था तो मुँह बनाने लगते थे. मुझे भी शर्मिंदगी सी महसूस होती थी कि अपने देश का अपमान हो रहा है.

वाशिंगटन में अब मैं अपने अमरीकी दोस्तों से बिलकुल यही शिकायत करता हूँ.

मैं ने सोचा था कि वाशिंगटन अमरीका का अमीर शहर है तो वो भीख मांगने वालों से वंचित होगा.

ये काफी छोटा शहर ज़रूर है पर यहाँ भिखारियों की कमीं नहीं है -- सड़कों पर, नुक्कड़ पर, मेट्रो स्टेशनों के बाहर आपको भीख मांगने वाला अलग-अलग अंदाज़ से भीख मांगता दिख जाएगा.

मेरे दफ़्तर के पास इन दिनों एक भिखारी जो मुझे खूब अच्छी तरह से जान गया है हर दिन मुझ से भीख मांगता है.

जिस दिन न दो वो 'हैव ए गुड डे' नहीं कहता.

एक शहर के एक भीड़-भाड़ वाले इलाक़े में एक भिखारी शम्मी कपूर की तरह उछल कूद कर गाना गा कर भीख मांगता है. कुछ लोग एक साथ मिल कर बाजा बजाकर गाना गा कर मेट्रो स्टेशनों के बाहर भीख मांगते मिल जायेंगे.

कुछ केवल सिगरेट मांगते हैं.

एक भीख मांगने वाले को मैं पिछले चार महीने से अलग-अलग जगहों पर देखता हूँ. उसने जब पहली बार मुझ से पैसे मांगे तो कहा उसे न्यूयॉर्क जाना है और उसके पास पैसे कम पड़ गए हैं. वो अच्छे कपड़े पहने था. शरीफ़ लग रहा था और ज़रुरतमंद भी.

मैं ने तरस खा कर दस डॉलर दे दिए. कुछ दिनों बाद वह एक दूसरी जगह पर नज़र आया. हमारी नज़रें चार हुईं लेकिन उसने मुझे नहीं पहचाना और वही झूठ दोहराया.

मैं ने उसे वह बात याद दिलाई. वह आगे बढ़ गया. अब जब हमारी नज़रें टकराती हैं तो वह ढीठ की तरह कहता है 'गिम्मी अ डॉलर प्लीज़' (एक डॉलर दे दो).

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