भारत ने दी थी चेतावनी

मोरारजी देसाई
Image caption मोरारजी देसाई भारत के वित्त मंत्री भी रहे और प्रधानमंत्री भी.

भारत ने वर्ष 1970 के अंत में कहा था कि अगर पाकिस्तान परमाणु हथियारों का विकास करने की कोशिश करता है तो इस प्रयास को सफल नहीं होने दिया जाएगा.

सत्तर के दशक में भारत के पहले परमाणु परीक्षणों के बाद दक्षिण एशिया को परमाणु मुक्त बनाने के लिए अमरीकी बातचीत के विफल हो जाने के बाद भारत ने ये बात कही थी.

ये बातें अमरीका के कुछ गुप्त दस्तावेज़ों में सामने आई हैं. ये दस्तावेज़ अब सार्वजनिक हुए हैं. इन दस्तावेज़ों से ये साफ़ हो चुका है कि 1977-81 के बीच अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने पुरज़ोर कोशिश की थी कि पाकिस्तान परमाणु हथियारों का विकास न करे.

पाकिस्तान भारत के 1974 में किए गए परमाणु परीक्षणों के बाद जल्द से जल्द परमाणु हथियारों का विकास करना चाहता था. पाकिस्तान ने सत्तर और अस्सी के दशक में तो परमाणु हथियारों का परीक्षण नहीं किया लेकिन 1998 में भारत के दूसरे परीक्षणों के कुछ ही दिनों बाद पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किए.

ये दस्तावेज़ जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव्स के पास हैं.

इनके अनुसार तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने भारत में अमरीकी राजदूत के साथ मुलाक़ात के दौरान दक्षिण एशिया को परमाणु मुक्त क्षेत्र बनाने के सुझाव को सिरे से ख़ारिज किया था. देसाई का मानना था कि जब तक चीन जैसे देशों के पास परमाणु हथियार हैं तब तक भारत दक्षिण एशिया को परमाणु मुक्त क्षेत्र बनाने के सुझाव पर अमल नहीं कर सकता.

इतना ही नहीं मोरारजी देसाई पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की कोशिश में थे. उन्होंने अमरीकी राजदूत से साफ़ कहा था कि वो सार्वजनिक रुप से विवाद नहीं चाहते लेकिन दक्षिण एशिया को परमाणु मुक्त क्षेत्र बनाने के प्रति पाकिस्तान की प्रतिबद्धता पर उनको संदेह है.

1979 में अमरीकी राजदूत रॉबर्ट गोहीन के एक मेमो के अनुसार मोरारजी ने एक पाकिस्तानी दूत से कहा था कि ''भारत पाकिस्तान के प्रति अच्छे विचार रखता है और उसे किसी मुश्किल में नहीं डालना चाहता लेकिन अगर पाकिस्तान ने कोई चाल चली तो उसे नष्ट कर दिया जाएगा.''

परमाणु हथियारों के विकास के मामले में केवल भारत को ही पाकिस्तान पर शक नहीं था बल्कि इस्लामाबाद में अमरीकी राजदूत ऑर्थर हुमेल ने तत्कालीन तानाशाह ज़िया उल हक को काहुटा परमाणु लेबोरेटरी की सेटेलाइट तस्वीरें दिखाकर पूछा था कि क्या गतिविधियां चल रही हैं.

हुमेल के अनुसार ज़िया ने इन आरोपों को बेबुनियाद करार दिया था और प्रस्ताव रखा था कि अमरीकी जांचकर्ता लेबोरेटरी आएं लेकिन पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था.

आगे चलकर 1979 में जब सोवियत संघ ने अफ़गानिस्तान पर हमला किया तो अमरीका और पाकिस्तान के रिश्तों में नाटकीय बदलाव आया. इसी दौरान अमरीका ने पाकिस्तान को चालीस करोड़ डॉलर की सहायता दी थी जिसे ज़िया उल हक ने ख़ारिज कर दिया था. 1981 में कार्टर की हार हुई और नए राष्ट्रपति बने रोनाल्ड रीगन.

नए दस्तावेज़ों के अनुसार कार्टर प्रशासन 1979 में सोवियत हमले से पहले ही पाकिस्तान को 30 करोड़ डॉलर का पैकेज देने का मन बना चुका था जिसमें एफ 16 लड़ाकू विमान भी शामिल थे.

इन दस्तावेज़ों में यह बात भी सामने आई है कि किस तरह फ्रांस ने 1978 में पाकिस्तान में एक प्लांट लगाने से सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया था क्योंकि फ्रांस को शक था कि पाकिस्तान इसका इस्तेमाल परमाणु हथियारों के विकास के लिए करेगा.

अमरीकी मेमो के अनुसार फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति वलेरी गिस्कार्ड डि एस्टेंग ने पाकिस्तान प्रशासन को एक पत्र लिखा जिसमें ''दोस्ती का हवाला दिया गया था और चिकनी चुपड़ी बातें लिखी थीं लेकिन प्लांट का कोई बाद सीधे तौर पर नहीं किया था.''

संबंधित समाचार