यूपी-उत्तरांचल में बाघों का आतंक

बाघ
Image caption जानकारों के अनुसार अक्सर जाड़े में बाघ घने जंगलों से बाहर निकल आते हैं

उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के जंगलों में बाघों ने एक हफ्ते में चार लोगों की जान ले ली है. इनमें से तीन लोग उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में कतर्नियाघाट जंगल में मारे गए, जबकि एक महिला कार्बेट टाइगर रिजर्व क्षेत्र में मारी गई.

पिछले एक साल में कतर्नियाघाट के आसपास बाघों और गुलदारों द्वारा आदमियों पर हमलों की अठारह घटनाएँ हो चुकी हैं, जिनमें दस लोग मारे गए और आठ घायल हुए.

इन घटनाओं से आसपास के ग्रामीण इलाकों में लोगों में आक्रोश है.

कतरनियाघाट में वन विभाग के अफसर आर के सिंह ने बताया कि मंगलवार को बाघ के हमले में मारे गए दुर्गापुर गाँव के दूबर नाम के व्यक्ति की लाश बुधवार को बरामद की गई ली गई.

दूबर का अधिकाँश शरीर बाघ खा गया, केवल पैर और धड़ का कुछ हिस्सा बरामद हुआ.

इस इलाके में इस हफ़्ते बाघों का यह तीसरा शिकार था. इससे पहले जमीनिया गाँव के जगमल और बेलहनपुरवा के सालिग्राम बाघ का शिकार हो चुके हैं.

गु़स्सा

मौक़े पर पहुँचे एक स्थानीय पत्रकार कदम रसूल ने बताया कि इलाके के लोग बहुत गुस्से में हैं.

जंगल विभाग के लोग पहुँचे तो स्थानीय लोगों ने उन्हें घेर लिया और मारने को दौड़े.

अफ़सरों ने किसी तरह लोगों को समझा बुझाकर क्षतविक्षत लाश कब्जे में ली और पोस्टमॉर्टम के लिए बहराइच भेजा.

मृतक के परिवार को दस हजार रूपये की तात्कालिक सहायता दी गई है.

उधर उत्तरांचल के कार्बेट रिजर्व क्षेत्र में एक बाघिन ने घास काटने गई एक महिला को अपना शिकार बना डाला. कार्बेट के पास दो महीने में चौथी महिला शेर का शिकार हुई है.

कानून के मुताबिक़ बाघ द्वारा मारे गए व्यक्ति के परिवार को मात्र एक लाख रूपये की आर्थिक सहायता मिलती है और गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को मात्र दस हजार.

स्थानीय लोग आर्थिक सहायता की धनराशि कम होने शिकायत करते हैं. यह सहायता मिलने में भी लोगों को काफी पापड बेलने पड़ते हैं.

उत्तर प्रदेश के मुख्य वन्य जीव संरक्षक कार्यालय यह आँकडा उपलब्ध नही करा सका कि पिछले साल कितने लोगों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई.

जाड़ा है कारण

कतरनिया घाट संरक्षित वन क्षेत्र लगभग चार सौ वर्ग किलोमीटर में फैला है. पिछली गिनती के अनुसार यहाँ 54 बाघ और 32 गुलदार हैं.

जानकारों का कहना है कि जाड़े के दिनों में अक्सर बाघ वन क्षेत्र से निकलकर आस-पास के गाँवों, विशेषकर गन्ने के खेतों में आ जाते हैं.

लोग जब चारा, जलावन लकडी या फूस काटने जंगल में जाते हैं तो बाघ घबराकर उन पर हमला कर देते हैं.

सदियों से इन जंगलों में रहने वाले लोगों को शिकायत है कि कानून बनाने वाले और वन विभाग के अफसर आदमी से ज्यादा जानवरों को महत्व देते हैं और वनों के प्रबंध में जनता की भागीदारी न होने से इंसान और वन्य जीवों के बीच संघर्ष बढते जा रहे हैं.

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