ख़ूबसूरत चेहरे और मन में बसा डर

करवाँ की बस में चढ़ आई एक तुर्की लड़की

ईरान की बात एशिया से गज़ा के सफ़र के महज़ एक मुल्क तक नहीं रह सकती, सच तो यह है कि ईरान पार हो जाने के बाद भी कारवां का खासा बोझ ईरान तरह-तरह से उठाता रहा.

भारत सरकार ने जब चिकित्सा उपकरण ले जाने की इजाज़त नहीं दी, तो ईरान ने करोड़ों के सामान दिए और वहां के कम से कम छह सांसदों सहित बहुत से लोग कारवां में मिस्र के पहले तक गए.

उनकी आशंका के मुताबिक़ मिस्र ने ईरानियों को वीज़ा देने से मना कर दिया और ईरानी साथी फ़लस्तीन नहीं जा पाए.

मैं देशों के खाते-बही की असलियत पर नहीं जा रहा लेकिन कारवां की पालकी को तीन कंधे तो ईरान के ही लगे थे. मैं तो इस काफ़िले में अखबारनवीस की हैसियत से शामिल था, लेकिन फ़लस्तीन की हिमायत में, इसराइल के ख़िलाफ़ अपनी पक्की सोच के चलते भी, या चलते ही, मैं यहां आया था.

इसलिए जब बीबीसी या किसी और मीडिया ने मुझसे बात की तो निजी विचारों में एक राजनीतिक आक्रामकता की झलक मिल ही जाती थी.

ईरान में महिलाएँ

रही बात ईरान की, तो महिलाओं के साथ अलग दर्जे का बर्ताव यूं खटकता रहा मानों बाज़ार से लाई गई रोटी में कोई कंकड़ निकला हो.

ईरानी महिलाओं को समाज से बस यह सहूलियत मिली हुई दिखी कि उन्हें रोटी नहीं बनानी पड़ती. मध्यपूर्व के देशों के बारे में दिखा कि वहां हर जगह रोटी बाज़ार में मिलती है.

महिलाओं के लिए यह तो राहत की बात थी, लेकिन दूसरी तरफ़ ईरान में आयोजकों की ओर से ही बताया गया कि वहां लोगों को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने पर तरह-तरह के नक़द पुरस्कार सरकार देती है.

मतलब यह कि रोटी बनाने की मशीन बाज़ार में, और बच्चों को पैदा करने के लिए... ईरानी महिला को हिजाब और चादर में देख-देखकर यह तो लगता था कि बादलों के बीच चांद निकला हो, लेकिन महिलाओं के लिए रौशनी देने में ईरान सुबह से काफी पीछे चल रहा है.

ईरान के कई शहरों के विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों में छात्र-छात्राएं अमरीका-इसराइल के ख़िलाफ़ युद्धोन्माद से लेकर धर्मोन्माद तक में डूबे दिखते थे, लेकिन कारवां के लोग उन्हें पूजनीय लगते थे.

लड़कियों और महिलाओं का तो लड़कों-आदमियों से अधिक बात करने का रिवाज़ वहां है नहीं, इसलिए जब कारवां से कोई युवती बीच में रहती तो हमारी बात हो पाती थी.

Image caption मध्यपूर्व में ज़्यादातर जगह महिलाओं को रोटियाँ नहीं बनानी पड़तीं क्योंकि वह इस तरह बिकती है

लेकिन कई जगहों पर लोग कारवां की मंज़िल की चर्चा होने पर रोने लगते थे.

एक कम उम्र लड़के ने जब एक ईरानी विश्वविद्यालय में मुझसे ठीक ठाक अंग्रेज़ी में कहा, "आप लोग बहुत महान हैं, मैं बड़ा होकर आप जैसा बनना चाहूंगा."

उसकी बात सुनकर मैं उसकी इस उम्मीद के सामने अपने आपको बहुत बौना महसूस करने लगा.

एक दूसरे विश्वविद्यालय में अमरीका के झंडे को रौंदते हुए ही मंच तक जाने का इंतज़ाम था. इसे देखकर मंच पर पहुंचे भारतीय मूल के, अमरीका में बसे एक मुसलमान बुज़ुर्ग ने माइक पर कहा, अगर ऐसा बर्ताव कोई ईरान के झंडे से करे तो उस पर तो अल्लाह भी लिखा हुआ है.

लेकिन तेज़ाब के सैलाब में ऐसी बात कहीं दूर जा गिरी और जगह-जगह लोग अमरीका और इसराइल के झंडे जलाते रहे.

ईरान में एक विश्वविद्यालय में चल रहे कार्यक्रम के बीच अचानक वहां राष्ट्रपति अहमदीनेजाद पहुँच गए. साधारण, आम इंसान से कपड़े, वही अंदाज़ और हर किसी से गले मिल लेने की बेतकल्लुफ़ी.

उनके आने की कोई ख़बर नहीं थी लेकिन उनकी सहजता इस सच से मिलती हुई थी कि वे राजधानी तेहरान की एक साधारण सी इमारत के एक साधारण फ्लैट में ही रहते हैं. जहां कि वे राष्ट्रपति बनने के पहले से रहते आए हैं.

एशिया से गज़ा तक के कारवां को इससे बड़ा समर्थन और क्या मिल सकता था?

मेज़बान बना डर की वजह

लेकिन महीने भर चले इस काफ़िले का ईरान से आगे बढऩा भी ज़रूरी है इसलिए मैं तुर्की की तरफ बढ़ता हूं, जहां हफ़्ते-दस दिन के बाद कारवां के लोगों की आंखों के सामने शराबख़ाने आने थे.

Image caption तुर्की के लोगों में उन लोगों की याद ताज़ा है जो पिछले साल फ़लस्तीन जा रहे पोत पर हुए इसराइली हमले में मारे गए थे

कारवां के कई वामपंथी, उदारवादी या मीडियाकर्मी तुर्की की देशी दारू 'राकी' की राह देख रहे थे, लेकिन पहली शाम के बाद यह विचार हुआ कि चूंकि सारे मेज़बान इस्लामी संगठन हैं, इसलिए लोगों का न पीना ही ठीक है. इस पर कुछ वैचारिक तनाव रहा लेकिन मोटे तौर पर कारवां के मक़सद को देखते हुए तुर्की की स्थानीय ख़ूबी से दूर रहने की बात तय हुई.

तुर्की में फिर औरत-बच्चे और मर्द, सभी कारवां की ख़ातिरदारी के लिए गर्मजोशी के साथ मौजूद थे और वहां इंसानी यार्दिम वक्फ़ी (आईएचएच) नाम का जो संगठन मेज़बान था, वह हमारी हिफ़ाज़त को लेकर ख़ासा फिक्रमंद था.

उनका मानना था कि कुछ बाहरी और कुछ भीतरी बाग़ी ताकतें कारवां पर हमला कर सकती हैं, इसलिए हमें सबसे अधिक चौकन्ना यहां किया गया.

लेकिन हममें से कुछ लोगों को एक सैद्धांतिक ख़तरा महसूस हो रहा था.

दुनिया के कुछ मुल्क आईएचएच को आतंकी संगठन मानते हैं, ऐसे में उसकी मेज़बानी स्वीकार करना कितना जायज़ है? मामला कुछ ऐसा था कि मानों भारत में कुछ कट्टपंथी-धार्मिक संगठन गांधीवादियों के साथ मिलकर पदयात्रा कर रहे हों और कट्टर-धार्मिक संगठन, कथित आतंकी संगठन मेज़बानी कर रहे हों.

लेकिन कारवां के बीच इस दिमाग़ी जमा ख़र्च से जब कोई राह न सूझी तो मैंने एक ही मक़सद के लिए अलग-अलग काम करते गांधी और भगत सिंह दोनों को याद करते हुए अपना ध्यान हटा लिया.

बर्फ से ढंकी पहाड़ियों वाले तुर्की में जब एक बास्केटबॉल कोर्ट में जाकर काफ़िला रूका, तो उसे बस के सफ़र के बारह घंटे हो चुके थे. लेकिन कारवां के जवान-बुज़ुर्ग सदस्य घंटों तक गेंदों को लेकर जिस तरह टूट पड़े, वह देखने लायक था.

आईएचएच के बारे में कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके रिश्ते अलक़ायदा से रहे हैं. तुर्की की सरकार ने भी इस संगठन पर बड़े छापे मारे थे.

इस संगठन के दो सबसे बड़े नेताओं से हम कुछ लोगों के लंबे सवाल-जवाब भी हुए, लेकिन उसकी जगह यहां पर नहीं है. यहां इतना लिखना ज़रूरी है कि इसराइल का एक बयान मीडिया में आया कि इस कारवां में आतंकी शामिल हैं और अलक़ायदा के लोग भी. इसे इंटरनेट पर पढ़कर लोगों के बीच यह चर्चा शुरू हुई कि क्या यह किसी हमले के लिए माहौल बनाया जा रहा है?

'शांतता कोर्ट चालू आहे'

ईरान के बाद तुर्की एक खुला हुआ, यूरोप की तरफ बढ़ा हुआ, अंग्रेज़ी वाली रोमन लिपि को अपनाया हुआ देश मिला जहां पर चांद रंग-बिरंगे बादलों के बीच निकले हुए थे.

Image caption अमरीकी झंडे के साथ हुए इस बर्ताव पर उठे सवाल पर किसी ने कान न दिया

ज़बान की दिक्क़त थी लेकिन रीति-रिवाज़ ईरान से कुछ अलग थे.

एक भाषण के बाद हमारे कारवाँ के एक-दो नौजवान साथियों को तुर्की की युवतियों ने जिस तरह घेरा और जिस तरह उनके आटोग्राफ़ लिए, ई-मेल पते लिए, वह देखने लायक था.

लेकिन तुर्की के पहले बड़े सड़क समारोह में सैकड़ों तस्वीरें खींचकर जब मैं एक ट्रक से उतरा, तो बच्चों ने घेर लिया. वे झंडों पर, कागज़ों पर मेरा आटोग्राफ चाहते थे.

मेरे गले में फ़लस्तीन के यासिर अराफ़ात की तरह वाला एक स्कार्फ था, और मेरी 'शहादत' बस उतनी ही थी. लेकिन जब मैंने बच्चों और लड़कियों की कलाई पर दस्तखत से मना कर दिया तो एक लड़की ने जिद करके अपनी जैकेट पर मुझसे दस्तखत लिए.

अंग्रेज़ी समझने वाले व्यक्ति से जब मैंने 12-13 बरस की दिखती एक लड़की से ऑटोग्राफ़ लेकर जैकेट ख़राब करवाने की वजह पूछी तो उसने कहा, "गज़ा जाने वालों की याद उसके पास हमेशा बनी रहेगी."

मेरे लिए यह अफ़सोस का वक्त भी था क्योंकि इसके साथ मेरी एक तस्वीर लेने वाला भी कोई आस-पास नहीं था. आगे हमारे और साथी भी आटोग्राफ देते-देते घिरे रहे.

ईरान से तुर्की में आते हुए ही सरहद पर हमारी एक साथी अजाम को रोक दिया गया.

पचपन बरस की अजाम, ईरान में पैदा हुईं लेकिन अब वह अमरीकी नागरिक हैं. अपने अमरीकी पति के साथ वह इन दिनों भारत में रह रहीं हैं और पहले पल से वह कारवां में सबके लिए फ़लस्तीनी टोपियां बुनती चल रहीं थीं.

ईरान उनकी कमज़ोर नब्ज़ थी और बीती यादों ने उन्हें वहाँ के सबसे बड़े धार्मिक नेता आयतुल्ला ख़ुमैनी की समाधि पर जाने से रोका था. लेकिन तुर्की ने उन्हें आने नहीं दिया कि उनका नाम वहां पुरानी किसी सक्रियता के चलते अवांछित लोगों की फ़ेहरिस्त में है.

कारवां के लोग सहम गए. तुर्की के बाद जब कारवां सीरिया पहुंचा, तो वहां सीधे पहुंची अजाम को आगे साथ रखने से मना कर दिया गया.

विजय तेंदुलकर के नाटक 'शांतता कोर्ट चालू आहे' की तर्ज़ पर उसके ख़िलाफ़ सौ बातें कही जाने लगीं और इंसाफ की फ़िक्र छोड़कर कारवां आगे बढ़ गया.

इस दौरान अरब दुनिया से तरह-तरह के लोग आकर जुड़ते गए लेकिन उस एक अकेली महिला जैसी कोई जांच-पड़ताल और किसी की नहीं हुई. कारवां के भीतर महिलाओं के बराबर के हक़ की बात उस दुनिया में रहने तक ताक पर धर दी गई थी और कारवां के गांधीवादी भी इस पर चुप ही थे.

एक राजनीतिक मक़सद को लेकर जा रहा यह कारवां अपने भीतर की एक बहुत ही समर्पित साथी पर लगे राजनीतिक सक्रियता के आरोप से पल भर में दहशत में आ गया था और अजाम को हम लोगों की आंखों से ही फ़लस्तीन देखना पड़ा.

(बाकी अगली किस्तों में).

(लेखक 'छत्तीसगढ़' अख़बार के संपादक हैं. इस स्तंभ में व्यक्त किए गए विचार लेखक के हैं बीबीसी के नहीं).

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